“सरकारी योजनाओं का लालच देकर खुलवाए खाते, कुछ घंटों में रकम ट्रांसफर; 800 खाताधारकों तक पहुंची जांच”

“₹34 करोड़ की साइबर ठगी का जाल: 1100 बैंक खातों के जरिए गरीबों को बनाया ‘मनी म्यूल’”

Roopa
By Roopa
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मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में साइबर ठगी के एक बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जहां 1100 बैंक खातों के जरिए करीब ₹34 करोड़ की धोखाधड़ी को अंजाम दिया गया। जांच में सामने आया है कि इन खातों का इस्तेमाल संगठित तरीके से साइबर अपराधियों द्वारा किया जा रहा था, जबकि अधिकांश खाताधारक गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से जुड़े हैं, जिन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के नाम पर झांसे में लिया गया।

प्रारंभिक जांच के अनुसार, वर्ष 2023 से लेकर अब तक इन खातों में केवल ठगी की रकम ट्रांसफर की गई है। हैरानी की बात यह है कि इन खातों का उपयोग सामान्य बैंकिंग लेनदेन के लिए नहीं किया गया, बल्कि इन्हें पूरी तरह से साइबर अपराध के लिए ही इस्तेमाल किया गया। साइबर पुलिस ने अब तक 1100 खातों की पहचान की है, जिनमें से 500 से अधिक खाते बंद हो चुके हैं, जबकि शेष खाते अभी भी सक्रिय पाए गए हैं।

जांच अधिकारियों के मुताबिक, इस पूरे नेटवर्क की जड़ में एक सुनियोजित रणनीति काम कर रही थी। साइबर ठग गांवों और छोटे कस्बों में रहने वाले गरीब लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने का झांसा देते थे। इसके बाद उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाए जाते थे। कई मामलों में खाताधारकों को मामूली रकम देकर उनके खातों का नियंत्रण पूरी तरह से अपने हाथ में ले लिया जाता था।

इन खातों में ठगी की रकम सीधे ट्रांसफर की जाती थी और कुछ ही घंटों के भीतर इसे कई अन्य खातों में बांट दिया जाता था, जिससे पैसों का ट्रेल पकड़ना मुश्किल हो जाता था। यह प्रक्रिया ‘लेयरिंग’ के जरिए की जाती थी, जो मनी लॉन्ड्रिंग का एक आम तरीका है। इसी कारण जांच एजेंसियों के लिए असली अपराधियों तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण बन जाता है।

जांच में यह भी सामने आया है कि मुरादाबाद जिले में सबसे अधिक बैंक खाते खोले गए। इसके अलावा बदायूं, संभल, रामपुर और बिजनौर जैसे जिलों के लोगों के नाम पर भी बड़ी संख्या में खाते खुलवाए गए। इन खातों में भी ठगी की रकम पहुंचने के प्रमाण मिले हैं। पुलिस अब इन सभी खातों की कड़ियों को जोड़ते हुए नेटवर्क के मास्टरमाइंड तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।

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अब तक की कार्रवाई में जांच एजेंसियां करीब 800 खाताधारकों तक पहुंच चुकी हैं। इनमें से अधिकांश लोगों ने बताया कि उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के नाम पर खाता खुलवाने के लिए कहा गया था। कुछ लोगों को इसके बदले थोड़ी-बहुत रकम भी दी गई, जिसके बाद उनके खातों का इस्तेमाल ठगी के लिए शुरू कर दिया गया। कई खाताधारकों को इस बात की जानकारी तक नहीं थी कि उनके खाते में करोड़ों रुपये का लेनदेन हो रहा है।

अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के मामलों में खाताधारक खुद भी कानूनी जोखिम में आ जाते हैं, भले ही वे सीधे तौर पर ठगी में शामिल न हों। इसलिए लोगों को सतर्क रहने और अपने बैंक खाते या दस्तावेज किसी के साथ साझा न करने की सलाह दी जा रही है।

इस पूरे मामले पर प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी Prof. Triveni Singh ने कहा कि ऐसे मामलों में साइबर अपराधी “मनी म्यूल नेटवर्क” का इस्तेमाल करते हैं। उनके मुताबिक, “गरीब और अनजान लोगों को लालच देकर उनके बैंक खातों का उपयोग किया जाता है, जिससे असली अपराधी पर्दे के पीछे सुरक्षित रहते हैं। यह पूरी तरह संगठित साइबर वित्तीय अपराध का हिस्सा है, जिसमें सोशल इंजीनियरिंग और वित्तीय लेयरिंग का संयोजन होता है।”

उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने बैंक खाते को किसी और के इस्तेमाल के लिए देता है, तो वह अनजाने में ही अपराध की श्रृंखला का हिस्सा बन सकता है। इसलिए बैंकिंग से जुड़ी जानकारी और दस्तावेजों को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है।

साइबर पुलिस का कहना है कि जिन लोगों ने समय रहते हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई, उनमें से करीब ₹9 करोड़ की रकम को फ्रीज कराकर वापस कराया जा चुका है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि त्वरित कार्रवाई से नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

यह मामला एक बार फिर संकेत देता है कि साइबर अपराध अब केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक कमजोरी का भी फायदा उठाकर किया जा रहा है। ऐसे में जहां जांच एजेंसियों को अपनी तकनीकी क्षमता मजबूत करनी होगी, वहीं आम लोगों को भी जागरूक और सतर्क रहना होगा, ताकि वे ऐसे जाल में फंसने से बच सकें।

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