ग्रेटर नोएडा। Gautam Buddha University में प्रोफेसरों की नियुक्ति को लेकर एक बड़ा भर्ती घोटाला सामने आया है। आरोप है कि 30 से 35 लाख रुपये तक लेकर कई प्रोफेसरों को नियमों के विपरीत नियमित कर दिया गया, जबकि वे निर्धारित शैक्षणिक और अनुभव संबंधी मानकों को पूरा ही नहीं करते थे। यह मामला वर्षों से दबा हुआ था, लेकिन अब आंतरिक जांच और दस्तावेजों की समीक्षा में कई गंभीर अनियमितताएं उजागर हुई हैं।
विश्वविद्यालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, 2010 से 2011 के बीच बड़ी संख्या में नियुक्तियां की गईं, जिनमें नियमों की अनदेखी कर चयन प्रक्रिया को प्रभावित किया गया। बाद में शिकायतों के आधार पर गठित जांच समिति ने पाया कि 70 से अधिक प्रोफेसरों को ‘एक्स कैटेगरी’ में रखा गया था। इस श्रेणी में वे उम्मीदवार शामिल थे, जिन्होंने जरूरी शैक्षणिक योग्यता, शोध कार्य या अनुभव मानकों को पूरा नहीं किया था। समिति ने स्पष्ट सिफारिश की थी कि ऐसे उम्मीदवारों को नियमित न किया जाए, लेकिन प्रभाव और दबाव के चलते इन सिफारिशों को नजरअंदाज कर दिया गया।
जांच में यह भी सामने आया कि कई उम्मीदवारों को सहायक प्रोफेसर या अनुसंधान सहायक जैसे पदों के लिए बुलाया गया था, लेकिन उन्हें सीधे उच्च पदों पर नियुक्त कर दिया गया। हैरानी की बात यह है कि कई पदों के लिए विधिवत विज्ञापन तक जारी नहीं किया गया था। इसके बावजूद चयन प्रक्रिया पूरी दिखाकर नियुक्तियां कर दी गईं।
सूत्रों का दावा है कि इस पूरी प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर पैसों का लेन-देन हुआ। आरोप है कि प्रत्येक नियुक्ति के लिए 30 से 35 लाख रुपये तक वसूले गए और उसी के आधार पर उम्मीदवारों को नियमित किया गया। यही नहीं, हर साल भर्ती के नियमों में बदलाव कर प्रक्रिया को इस तरह मोड़ा गया कि चयनित उम्मीदवारों को फायदा मिल सके।
भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी की जांच के लिए गठित समिति ने विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें नियुक्तियों को तीन श्रेणियों—Z, Y और X—में विभाजित किया गया। Z कैटेगरी में वे नियुक्तियां रखी गईं, जो पूरी तरह नियमों के अनुरूप थीं। Y कैटेगरी में वे मामले शामिल थे, जिनमें कुछ कमियां थीं लेकिन उन्हें सुधारा जा सकता था। वहीं X कैटेगरी सबसे गंभीर पाई गई, जहां उम्मीदवारों ने बुनियादी पात्रता मानदंड तक पूरे नहीं किए थे, फिर भी उन्हें चयनित कर लिया गया।
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रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि कई उम्मीदवारों के पास साक्षात्कार के समय न तो न्यूनतम अनुभव था और न ही आवश्यक शोध प्रकाशन। इसके बावजूद चयन समिति के समक्ष उनकी उपस्थिति को पर्याप्त मानते हुए उन्हें नियुक्त कर दिया गया। बाद में 2018 में गठित एक अन्य समिति ने भी इन नियुक्तियों को अयोग्य करार दिया, लेकिन तब भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
इस पूरे मामले में यह भी आरोप है कि विश्वविद्यालय के तत्कालीन शीर्ष अधिकारियों और चयन प्रक्रिया से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोगों के बीच नजदीकी संबंध होने के कारण कार्रवाई को लगातार टाला जाता रहा। यही वजह रही कि इतने बड़े स्तर की अनियमितताएं वर्षों तक दबाकर रखी गईं।
इसी बीच, विश्वविद्यालय में RUSA Fund के तहत हुए कार्यों पर भी सवाल उठने लगे हैं। करीब ₹10 करोड़ की राशि से कराए गए विकास कार्यों की अब अलग से जांच कराई जाएगी। सूत्रों के अनुसार, फाइलों का सत्यापन कराया जा रहा है और खर्च की पारदर्शिता की जांच के लिए समिति गठित की जाएगी। विश्वविद्यालय को RUSA के तहत कुल ₹20 करोड़ मिलना था, जिसमें से अब तक केवल ₹10 करोड़ ही प्राप्त हुए हैं। शेष राशि के लिए अगला प्रस्ताव तभी भेजा जाएगा, जब वर्तमान खर्च का पूरा सत्यापन हो जाएगा।
विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए यह मामला प्रतिष्ठा से जुड़ा बन गया है। एक ओर जहां भर्ती घोटाले ने संस्थान की साख पर सवाल खड़े किए हैं, वहीं दूसरी ओर वित्तीय अनियमितताओं की जांच ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
अब नजर इस बात पर है कि इन खुलासों के बाद जिम्मेदारों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है और क्या वर्षों से लंबित इस विवाद में वास्तव में जवाबदेही तय हो पाएगी।
