अहमदाबाद/मोर्बी। साइबर ठगी के एक मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक गैरेज मैकेनिक को नियमित जमानत दे दी है। यह मामला ₹3,33,500 की साइबर धोखाधड़ी से जुड़ा है, जिसमें आरोपी पर आरोप था कि उसके मोबाइल हॉटस्पॉट का उपयोग कर ठगी की गई थी। अदालत ने अपने प्रारंभिक अवलोकन में कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी की भूमिका सीमित प्रतीत होती है और उसके खिलाफ प्रत्यक्ष रूप से अपराध में शामिल होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है। Gujarat High Court
मामले के अनुसार आरोपी बनवारीलाल यादव, जो एक गैरेज मैकेनिक है, को दिसंबर 2025 में गिरफ्तार किया गया था। वह 22 दिसंबर 2025 से न्यायिक हिरासत में था। उस पर आरोप था कि साइबर अपराध में इस्तेमाल की गई ऑनलाइन गतिविधि उसके मोबाइल हॉटस्पॉट से जुड़े IP एड्रेस के माध्यम से की गई थी। हालांकि जांच में यह भी सामने आया कि कथित मुख्य आरोपी राहुल मीना ने उसके हॉटस्पॉट का इस्तेमाल कर साइबर फ्रॉड को अंजाम दिया था।
पुलिस ने यह मामला दर्ज करते हुए जांच शुरू की थी कि एक पीड़ित व्यक्ति को संदिग्ध संदेश के जरिए ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार बनाया गया, जिसके बाद उसके खाते से ₹3,33,500 की राशि निकाल ली गई। यह शिकायत मोर्बी शहर के ‘A’ डिवीजन पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी। Morbi City ‘A’ Division Police Station
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपी का इस पूरे अपराध से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है और उसे केवल इसलिए फंसाया गया क्योंकि तकनीकी रूप से उसका मोबाइल नेटवर्क इस्तेमाल हुआ था। अदालत ने भी इस तर्क को महत्वपूर्ण माना और कहा कि प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट नहीं है कि आरोपी ने जानबूझकर किसी भी प्रकार की सहायता या सहमति दी हो।
FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference
न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा कि जांच पहले ही चार्जशीट चरण तक पहुंच चुकी है और आरोपी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने उसे जमानत देने का निर्णय लिया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि यह टिप्पणी केवल जमानत के उद्देश्य से की गई है और इसका प्रभाव अंतिम ट्रायल पर नहीं पड़ेगा।
जांच एजेंसियों के अनुसार यह मामला एक बड़े साइबर फ्रॉड नेटवर्क का हिस्सा भी हो सकता है, जहां तकनीकी माध्यमों का उपयोग कर निर्दोष लोगों के इंटरनेट कनेक्शन या डिवाइस को माध्यम बनाया जाता है। इस तरह के मामलों में अक्सर असली अपराधी डिजिटल पहचान छुपाकर दूसरों के नेटवर्क का उपयोग करते हैं, जिससे जांच जटिल हो जाती है।
इस केस ने साइबर सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं कि किस तरह छोटे स्तर के तकनीकी संसाधनों का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर ठगी की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में डिजिटल साक्ष्यों की गहराई से जांच और नेटवर्क ट्रेसिंग बेहद जरूरी है।
फिलहाल आरोपी को जमानत मिलने के बाद मामले की सुनवाई आगे जारी रहेगी और ट्रायल के दौरान यह तय किया जाएगा कि वह वास्तव में किसी साजिश का हिस्सा था या केवल परिस्थितियों का शिकार बना। जांच एजेंसियां अब भी इस पूरे नेटवर्क के अन्य कड़ियों की तलाश में जुटी हुई हैं।
