रायपुर/छत्तीसगढ़। ₹11.44 करोड़ के कथित फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) घोटाले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 49 वर्षीय आरोपी संतोष वाधवानी को जमानत दे दी है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मामले की जांच लगभग पूरी हो चुकी है और जो साक्ष्य प्रस्तुत किए गए हैं, वे मुख्य रूप से दस्तावेजी प्रकृति के हैं, ऐसे में आगे की न्यायिक हिरासत की आवश्यकता नहीं रह जाती।
मामले के अनुसार, आरोपी को जनवरी 2026 में डायरेक्टरेट जनरल ऑफ जीएसटी इंटेलिजेंस (DGGI), रायपुर यूनिट द्वारा गिरफ्तार किया गया था। उस पर आरोप है कि उसने कथित रूप से कई फर्जी फर्मों के माध्यम से गलत तरीके से इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ लिया। जांच एजेंसियों के अनुसार, इस पूरे नेटवर्क में चार ऐसी फर्मों का नाम सामने आया है—M/s Aksha Trading, M/s M.K. Enterprises, M/s Dishankar Trading और M/s Giridhar Gopal Impex Pvt. Ltd.—जिनका वास्तविक व्यवसाय मौजूद नहीं था और ये केवल कागजों पर ही संचालित हो रही थीं।
आरोप है कि इन फर्जी फर्मों के जरिए नकली बिल तैयार किए गए और उसी आधार पर करोड़ों रुपये का गलत ITC क्लेम किया गया, जिससे सरकार को लगभग ₹11.44 करोड़ का नुकसान हुआ। यह मामला जीएसटी प्रणाली में मौजूद डिजिटल इनवॉइसिंग और टैक्स क्रेडिट मैकेनिज्म के दुरुपयोग से जुड़ा माना जा रहा है।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि आरोपी को अनावश्यक रूप से हिरासत में रखा गया है, जबकि जांच एजेंसी के पास सभी आवश्यक दस्तावेज पहले से मौजूद हैं। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि अब किसी भी तरह की कस्टोडियल पूछताछ की जरूरत नहीं है क्योंकि जांच अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है।
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वहीं अभियोजन पक्ष ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि आरोपी ने एक संगठित तरीके से फर्जी कंपनियों का संचालन कर बड़े पैमाने पर टैक्स क्रेडिट का गलत लाभ उठाया है, जो सार्वजनिक धन से जुड़ा गंभीर आर्थिक अपराध है। इसलिए उसे जमानत देना उचित नहीं होगा।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में अधिकांश साक्ष्य दस्तावेजों पर आधारित हैं और जांच काफी हद तक पूरी हो चुकी है। अदालत ने यह भी कहा कि जब जांच पूरी हो चुकी हो और आरोपी से आगे पूछताछ की आवश्यकता न हो, तो हिरासत में रखना उचित नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी नोट किया कि आरोपित अपराध अधिकतम पांच साल तक की सजा के दायरे में आते हैं। मामले की गंभीरता, जांच की स्थिति और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए अदालत ने आरोपी को जमानत देने का आदेश दिया। साथ ही निर्देश दिया गया कि आरोपी ₹1 लाख का निजी मुचलका और एक सक्षम जमानतदार पेश करे।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आर्थिक अपराधों में अदालतों के उस रुख को दर्शाता है, जहां दस्तावेजी साक्ष्य और जांच पूरी होने के बाद लंबी हिरासत को आवश्यक नहीं माना जाता। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसे मामलों की गंभीरता कम हो जाती है।
अब यह मामला ट्रायल चरण में आगे बढ़ेगा, जहां अदालत यह तय करेगी कि आरोपित फर्में वास्तव में अस्तित्व में थीं या केवल कर चोरी के उद्देश्य से बनाई गई थीं। जांच एजेंसियां इस तरह के अन्य नेटवर्क की भी जांच कर रही हैं, जिनके इस केस से जुड़े होने की आशंका है।
जमानत मिलने के बाद आरोपी अब ट्रायल में पेशी के लिए उपलब्ध रहेगा, जबकि यह मामला देश में चल रहे बड़े स्तर के GST फ्रॉड और शेल कंपनी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई का एक और महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है।
