“डिजिटल ठगी पर बड़ा कानूनी रुख: फर्जी वेबसाइट्स और डोमेन नेम के दुरुपयोग पर हाई कोर्ट सख्त, रजिस्ट्रार पर बढ़ी जवाबदेही”

“ऑनलाइन फ्रॉड पर ब्रेक लगाने की तैयारी: डाबर केस बना मिसाल, साइबर स्क्वैटिंग अब गंभीर साइबर अपराध”

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By Roopa
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नई दिल्ली। साइबर अपराध और डिजिटल धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों के बीच दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ऑनलाइन फ्रॉड और साइबर ठगी की संरचना को नई कानूनी दिशा दे दी है। डाबर इंडिया लिमिटेड बनाम अशोक कुमार एवं अन्य मामले में अदालत ने कहा कि बड़े पैमाने पर ब्रांड नाम का दुरुपयोग केवल साइबर स्क्वैटिंग नहीं, बल्कि “सिस्टमेटिक साइबर फ्रॉड” है, जिसे गंभीर अपराध के रूप में देखा जाना चाहिए।

यह मामला उस समय सामने आया जब डाबर इंडिया लिमिटेड ने पाया कि उसके नाम से मिलते-जुलते कई फर्जी डोमेन जैसे daburdistributorships.in, daburdistributor.com और daburfranchisee.in बनाए गए हैं। इन वेबसाइट्स पर लोगों को गलत तरीके से यह विश्वास दिलाया जा रहा था कि वे कंपनी के आधिकारिक पोर्टल से जुड़े हैं और उनसे निवेश, फ्रेंचाइज़ी या नौकरी के नाम पर पैसे और निजी जानकारी मांगी जा रही थी।

अदालत ने सुनवाई के दौरान यह पाया कि इन फर्जी वेबसाइट्स के जरिए आम नागरिकों को लगातार ठगा जा रहा था और जब तक शिकायतें दर्ज होती थीं, तब तक आरोपी वेबसाइट्स गायब होकर नई पहचान के साथ फिर से सक्रिय हो जाती थीं। इस चक्रीय प्रक्रिया ने ऑनलाइन धोखाधड़ी को और जटिल बना दिया था।

डाबर की ओर से दलील दी गई कि “डाबर” एक प्रसिद्ध ट्रेडमार्क है और इसके नाम का उपयोग कर लोगों को भ्रमित करना न केवल ब्रांड की साख को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि यह सीधे आर्थिक धोखाधड़ी को बढ़ावा देता है। कंपनी ने यह भी बताया कि डोमेन रजिस्ट्रेशन के समय वास्तविक पहचान छिपाने के कारण अपराधियों को पकड़ना लगभग असंभव हो जाता है।

डोमेन नाम रजिस्ट्रार (DNR) और ICANN की ओर से कहा गया कि वे मौजूदा कानूनों के तहत मध्यस्थ (intermediary) की भूमिका निभाते हैं और केवल तकनीकी सेवा प्रदान करते हैं। उनके अनुसार, वे सीधे तौर पर कंटेंट या उपयोगकर्ताओं की गतिविधियों को नियंत्रित नहीं करते।

हालांकि, अदालत ने इस तर्क को आंशिक रूप से खारिज करते हुए कहा कि जब किसी प्लेटफॉर्म को धोखाधड़ी की जानकारी मिल जाती है, तो उसकी निष्क्रियता उसे “न्यूट्रल इंटरमीडियरी” की श्रेणी से बाहर कर देती है।

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न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह ने अपने फैसले में कहा कि डिजिटल सिस्टम में मौजूद खामियां ही साइबर अपराधियों को बढ़ावा देती हैं। अदालत ने कई अहम निर्देश जारी किए, जिनमें डोमेन रजिस्ट्रेशन के लिए अनिवार्य KYC, समय-समय पर डेटा वेरिफिकेशन और रजिस्ट्रेंट की वास्तविक पहचान का खुलासा शामिल है।

फैसले में यह भी कहा गया कि अब डोमेन नाम रजिस्ट्रार केवल तकनीकी सुविधा देने वाले संस्थान नहीं रह सकते, बल्कि उन्हें धोखाधड़ी रोकने में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। यदि कोई रजिस्ट्रार फर्जी डोमेन को समय रहते नहीं हटाता या उस पर कार्रवाई नहीं करता, तो उसे कानूनी जिम्मेदारी का सामना करना पड़ सकता है।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि किसी भी फर्जी डोमेन को 72 घंटे के भीतर पहचानकर हटाना अनिवार्य होगा और ऐसे डोमेन को दोबारा रजिस्टर करने पर रोक लगाई जाएगी।

साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भारत में साइबर सुरक्षा कानूनों के लिए एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी, जिससे ऑनलाइन फ्रॉड पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकेगी।

हालांकि, विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि साइबर अपराधी लगातार नए तरीके अपना रहे हैं और जैसे-जैसे नियम सख्त होंगे, वे अधिक परिष्कृत तकनीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

फिलहाल यह मामला साइबर कानून, ट्रेडमार्क सुरक्षा और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बनकर सामने आया है।

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