बेंगलुरु। इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के बढ़ते क्रेज के बीच साइबर ठगों ने अब टिकट खरीदने वालों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। ऐसा ही एक मामला बेंगलुरु से सामने आया है, जहां एक महिला सुरक्षा गार्ड को फर्जी आईपीएल टिकट के नाम पर ₹52,500 की ठगी का शिकार बना लिया गया। इस घटना ने एक बार फिर ऑनलाइन टिकटिंग से जुड़े जोखिमों और साइबर ठगी के बढ़ते खतरे को उजागर कर दिया है।
पीड़िता, जो एक निजी सुरक्षा कंपनी में कार्यरत है, शहर के एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम में ड्यूटी पर तैनात थी। 28 मार्च को मैच के दौरान उसने स्टेडियम में मौजूद एक बाउंसर से टिकट के बारे में जानकारी ली। बाउंसर ने उसे एक मोबाइल नंबर दिया और भरोसा दिलाया कि इस नंबर के जरिए उसे आसानी से टिकट मिल जाएंगे। यहीं से ठगी का सिलसिला शुरू हुआ।
शिकायत के अनुसार, पीड़िता ने सबसे पहले ₹3,000 का ऑनलाइन भुगतान कर दो टिकट खरीदने की कोशिश की। इसके बाद आरोपी ने उसके नाम पर QR कोड भेजे, जो देखने में बिल्कुल असली टिकट जैसे लग रहे थे। इन डिजिटल पासों ने उसका भरोसा जीत लिया। ठग ने इसी भरोसे का फायदा उठाते हुए उसे और टिकट खरीदने के लिए प्रेरित किया।
धीरे-धीरे पीड़िता ने पांच अलग-अलग ट्रांजेक्शन के जरिए कुल ₹52,500 आरोपी के खाते में ट्रांसफर कर दिए। ये भुगतान 30 मार्च से 4 अप्रैल के बीच किए गए। हर बार उसे यह भरोसा दिलाया गया कि टिकट जल्द ही उपलब्ध हो जाएंगे। लेकिन जब तय समय तक उसे असली मैच पास नहीं मिले और आरोपी ने कॉल व मैसेज का जवाब देना बंद कर दिया, तब उसे ठगी का अहसास हुआ।
इसके बाद पीड़िता ने केंद्रीय डिवीजन साइबर क्राइम थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। शुरुआती जांच में यह संकेत मिले हैं कि यह कोई अकेले व्यक्ति का काम नहीं, बल्कि एक संगठित साइबर ठगी गिरोह का हिस्सा हो सकता है, जो बड़े आयोजनों के दौरान टिकट की भारी मांग का फायदा उठाता है।
जांच एजेंसियां अब उस बैंक खाते की पड़ताल कर रही हैं, जिसमें पैसे ट्रांसफर किए गए थे। साथ ही मोबाइल नंबर, डिजिटल भुगतान ट्रेल और इस्तेमाल किए गए QR कोड की तकनीकी जांच भी की जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि इस नेटवर्क के तार अन्य राज्यों या शहरों तक भी जुड़े हो सकते हैं।
साइबर अपराध के जानकारों का कहना है कि इस तरह की ठगी में सोशल इंजीनियरिंग की तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। इस संबंध में प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह कहते हैं, “ऐसे मामलों में अपराधी पहले छोटे ट्रांजेक्शन के जरिए पीड़ित का भरोसा जीतते हैं और फिर धीरे-धीरे बड़ी रकम निकलवाते हैं। फर्जी QR कोड और डिजिटल पास इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि वे बिल्कुल असली लगें, जिससे आम लोग आसानी से जाल में फंस जाते हैं।”
पुलिस ने आम नागरिकों को आगाह करते हुए कहा है कि किसी भी अनजान व्यक्ति या अनधिकृत स्रोत से टिकट खरीदने से बचें। खासकर ऑनलाइन भुगतान करने से पहले विक्रेता की विश्वसनीयता की जांच जरूर करें। किसी भी प्रकार के अग्रिम भुगतान से पहले आधिकारिक वेबसाइट या अधिकृत विक्रेताओं का ही उपयोग करना सुरक्षित रहता है।
इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति संदिग्ध लिंक, QR कोड या ऑफर साझा करता है, तो उसकी पुष्टि किए बिना भुगतान न करें। साइबर ठग अक्सर जल्दबाजी और सीमित समय के ऑफर का दबाव बनाकर लोगों को निर्णय लेने पर मजबूर करते हैं।
आईपीएल जैसे बड़े आयोजनों के दौरान टिकटों की मांग बढ़ने के साथ ही इस तरह के साइबर अपराधों में भी तेजी देखी जा रही है। ऐसे में सतर्कता और जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है।
फिलहाल, पुलिस इस मामले में आरोपियों की पहचान करने और पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश करने में जुटी है। आने वाले दिनों में इस मामले से जुड़े और खुलासे होने की संभावना है, जो यह स्पष्ट कर सकते हैं कि इस तरह के साइबर गिरोह किस स्तर पर काम कर रहे हैं और कितने लोगों को अपना शिकार बना चुके हैं।
