वैश्विक साइबर सुरक्षा परिदृश्य को हिला देने वाली एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनिया भर में ऑनलाइन फ्रॉड के कारण हर वर्ष 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का नुकसान हो रहा है। TIME की रिपोर्ट और Global Anti-Scam Alliance के आंकड़ों के अनुसार बीते वर्ष हर चार में से एक व्यक्ति किसी न किसी रूप में साइबर ठगी का शिकार हुआ, जबकि लगभग 13 प्रतिशत लोग प्रतिदिन किसी न किसी स्कैम प्रयास का सामना कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र ने इस बढ़ते संकट को “स्कैमडेमिक” नाम दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार इस वैश्विक साइबर अपराध नेटवर्क का बड़ा केंद्र दक्षिण-पूर्व एशिया बन चुका है, जहां म्यांमार, लाओस और कंबोडिया जैसे देशों में लगभग 3 लाख लोग 65 से अधिक देशों से लाकर या तो जबरन या लालच देकर स्कैम कंपाउंड्स में काम करने के लिए मजबूर किए गए हैं। इन अत्यधिक सुरक्षित परिसरों को अब “स्कैम जेल” कहा जा रहा है, जहां पीड़ितों से रोमांस-इन्वेस्टमेंट फ्रॉड, क्रिप्टो घोटाले, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध ऑनलाइन जुए जैसे अपराध करवाए जाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने इन अपराधों को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है। AI अब केवल स्कैम संदेश तैयार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अलग-अलग भाषाओं में अनुवाद, फर्जी प्रोफाइल निर्माण और डीपफेक फोटो-वीडियो बनाकर लोगों को अधिक विश्वसनीय तरीके से फंसाने में सक्षम हो गया है। इससे अपराधियों की पहुंच वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ी है।
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रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि बड़े तकनीकी क्षेत्र में नौकरियों में आई कमी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। पिछले तीन वर्षों में प्रमुख टेक कंपनियों की भर्ती लगभग आधी रह गई है, जिससे कई प्रशिक्षित युवा बेरोजगारी या अस्थिर रोजगार की ओर धकेले जा रहे हैं। कुछ मामलों में लोग स्वेच्छा से भी इन साइबर अपराध नेटवर्क का हिस्सा बन रहे हैं।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार AI आधारित टूल्स ने ठगी की रणनीतियों को अत्यधिक परिष्कृत और तेज बना दिया है, जिससे पारंपरिक सुरक्षा प्रणालियां कमजोर पड़ रही हैं। डिजिटल फर्जीवाड़े अब पहले की तुलना में अधिक व्यक्तिगत और लक्षित हो गए हैं, जिससे आम उपयोगकर्ता के लिए असली और नकली संदेश की पहचान करना कठिन हो गया है।
इस पर “प्रतिष्ठित साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह” ने कहा कि AI आधारित साइबर अपराध अब वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। उनके अनुसार, “आज अपराधी सोशल इंजीनियरिंग और जनरेटिव AI का उपयोग कर इतने वास्तविक फर्जी परिदृश्य तैयार कर रहे हैं कि आम नागरिक ही नहीं, तकनीकी विशेषज्ञ भी कई बार भ्रमित हो जाते हैं। डिजिटल जागरूकता और रियल-टाइम फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम समय की सबसे बड़ी आवश्यकता हैं।”
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत साइबर सुरक्षा सहयोग और AI पर सख्त नियमन लागू नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में यह “स्कैमडेमिक” वैश्विक अर्थव्यवस्था और डिजिटल भरोसे के लिए और बड़ा खतरा बन सकता है। वर्तमान स्थिति ने सरकारों, तकनीकी कंपनियों और सुरक्षा एजेंसियों के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है, जहां हर दिन लाखों लोग नए-नए तरीकों की ऑनलाइन ठगी का शिकार हो रहे हैं।
डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ साइबर सुरक्षा को लेकर वैश्विक सहयोग की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकारें, टेक कंपनियां और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां मिलकर रियल-टाइम थ्रेट इंटेलिजेंस, एआई आधारित फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम और सख्त साइबर कानूनों को लागू नहीं करतीं, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहरा हो सकता है। आम उपयोगकर्ताओं के लिए डिजिटल जागरूकता, मजबूत पासवर्ड सिस्टम, टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन और संदिग्ध लिंक से बचाव जैसे कदम सबसे प्रभावी सुरक्षा उपाय साबित हो सकते हैं। तेजी से बदलते डिजिटल परिदृश्य में यह चुनौती केवल तकनीकी नहीं बल्कि सामाजिक स्तर पर भी गंभीर होती जा रही है।
