वीडियोकॉन लोन डिफॉल्ट मामले में NCLT ने वेणुगोपाल धूत के खिलाफ व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया मंजूर की, SBI की वसूली कार्रवाई को बल मिला।

₹6,157 करोड़ घोटाले में घिरी वीडियोकॉन: व्यक्तिगत गारंटर धूत पर कार्रवाई तेज, NCLT ने खोला वसूली का रास्ता

Team The420
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मुंबई: देश के सबसे बड़े बैंकिंग डिफॉल्ट मामलों में से एक वीडियोकॉन समूह से जुड़े केस में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने एक अहम फैसला सुनाया है। ट्रिब्यूनल ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की याचिका स्वीकार करते हुए पूर्व वीडियोकॉन मैनेजिंग डायरेक्टर वेणुगोपाल नंदलाल धूत के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति दे दी है। इस आदेश के बाद बैंकिंग और कॉरपोरेट सेक्टर में इस हाई-प्रोफाइल मामले को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है।

मुंबई बेंच ने यह आदेश दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (IBC) की धारा 95 के तहत पारित किया है। आदेश के तहत एक रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल की नियुक्ति की गई है, जो पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेगा और धूत की वित्तीय स्थिति, संपत्तियों और देनदारियों की विस्तृत जांच करेगा। साथ ही, अदालत ने उनके खिलाफ किसी भी नई वसूली या कानूनी कार्रवाई पर 180 दिनों के लिए मोरेटोरियम (अस्थायी रोक) भी लागू कर दी है।

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SBI ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि वेणुगोपाल धूत पर कुल ₹6,157.57 करोड़ की बकाया देनदारी है। यह राशि फरवरी 2018 से चले आ रहे बड़े लोन डिफॉल्ट से जुड़ी है। बैंक का कहना है कि धूत ने वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज लिमिटेड और वीडियोकॉन टेलीकम्युनिकेशंस लिमिटेड द्वारा लिए गए ऋणों के लिए व्यक्तिगत गारंटर की भूमिका निभाई थी, लेकिन कई बार नोटिस जारी होने के बावजूद उन्होंने भुगतान नहीं किया।

ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि चूंकि मूल कंपनियां पहले ही 2018 में दिवालिया प्रक्रिया में जा चुकी हैं, इसलिए अब व्यक्तिगत गारंटर की जिम्मेदारी भी कानूनी रूप से लागू होती है। NCLT ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में लिमिटेशन पीरियड की गणना उस समय से शुरू होती है जब औपचारिक डिमांड नोटिस जारी किया जाता है, न कि मूल डिफॉल्ट की तारीख से।

आदेश में कहा गया कि बैंक की याचिका कानून के सभी आवश्यक मानकों को पूरा करती है और बार-बार डिफॉल्ट तथा बकाया राशि की पुष्टि के बाद यह कार्रवाई उचित और वैध है। इस फैसले के बाद अब SBI को केवल कंपनी की संपत्तियों से ही नहीं, बल्कि धूत की व्यक्तिगत संपत्तियों से भी वसूली का कानूनी अधिकार मिल गया है।

यह पूरा मामला वीडियोकॉन समूह के उस बड़े वित्तीय संकट से जुड़ा है, जिसने पिछले कई वर्षों में भारतीय बैंकिंग सिस्टम को गहरी चोट पहुंचाई थी। समूह पर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेश से जुड़े कई बड़े लोन डिफॉल्ट के आरोप रहे हैं, जिससे हजारों करोड़ रुपये की देनदारी पैदा हुई।

इस मामले में जांच एजेंसियों की भूमिका भी लगातार बढ़ती रही है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पहले ही इस केस से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में चार्जशीट दाखिल कर रखी है। इसके अलावा, दिल्ली की एक अदालत ने भी बैंक फ्रॉड से जुड़े एक अन्य मामले में संज्ञान लिया है, जिससे जांच का दायरा और व्यापक हो गया है।

आरोपों के अनुसार, वीडियोकॉन समूह ने विदेशी परियोजनाओं, खासकर अफ्रीकी देश मोजाम्बिक में तेल और गैस निवेश के लिए भारी-भरकम लोन लिया था। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि क्या इन फंड्स का सही उपयोग हुआ या इन्हें जटिल वित्तीय संरचनाओं के जरिए कहीं और डायवर्ट किया गया।

NCLT के इस ताजा आदेश के बाद अब वसूली प्रक्रिया को और गति मिलने की उम्मीद है। नियुक्त रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल धूत की संपत्तियों, बैंक खातों, निवेश और अन्य वित्तीय लेन-देन की गहन जांच करेगा। हालांकि, मोरेटोरियम अवधि के दौरान कोई नई रिकवरी कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकेगी, लेकिन दस्तावेजी सत्यापन और जांच प्रक्रिया जारी रहेगी।

वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बड़े कॉरपोरेट लोन डिफॉल्ट मामलों में व्यक्तिगत गारंटर की जवाबदेही को और मजबूत करता है। इससे यह स्पष्ट संदेश जाता है कि अब केवल कंपनियां ही नहीं, बल्कि उनके शीर्ष अधिकारी भी कानूनी दायरे से बाहर नहीं रहेंगे।

फिलहाल, वीडियोकॉन केस से जुड़े सभी पहलुओं पर जांच और कानूनी प्रक्रिया अलग-अलग एजेंसियों के स्तर पर जारी है। आने वाले समय में संपत्तियों की बिक्री, दावों के निपटान और वसूली प्रक्रिया इस बहु-हजार करोड़ रुपये के मामले की दिशा तय करेगी।

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