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आतंकी साजिश का डर, फर्जी दस्तावेज और लगातार निगरानी: नोएडा में ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर ठगी का शिकार बना परिवार

Team The420
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नोएडा: उत्तर प्रदेश के नोएडा में साइबर अपराध का एक बेहद चौंकाने वाला और डरावना मामला सामने आया है, जहां एक एमबीबीएस फाइनल ईयर की छात्रा और उसके पूरे परिवार को करीब पांच दिनों तक “डिजिटल अरेस्ट” में रखकर ठगों ने फर्जी CBI अधिकारी बनकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया और वीडियो कॉल पर लगातार निगरानी में रखा।

पुलिस और पीड़ित परिवार के अनुसार, यह पूरा मामला 6 अप्रैल को शुरू हुआ जब एमबीबीएस छात्रा के पास एक अनजान नंबर से कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को जांच एजेंसी से जुड़ा अधिकारी बताया और दावा किया कि छात्रा के आधार कार्ड का गलत इस्तेमाल कर एक सिम कार्ड जारी किया गया है, जिसका संबंध दिल्ली के लाल किले के पास कथित ब्लास्ट की बातचीत से बताया जा रहा है।

इसके बाद ठगों ने आरोपों को और गंभीर बनाते हुए कहा कि छात्रा के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर एक बैंक खाता खोला गया है, जिसमें पाकिस्तान से पैसे ट्रांसफर हुए हैं और इनका उपयोग आतंकी गतिविधियों में किया गया है। इस तरह के गंभीर और झूठे आरोपों से पूरा परिवार भय और मानसिक दबाव में आ गया।

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विश्वास कायम करने के लिए साइबर ठगों ने व्हाट्सऐप पर फर्जी सरकारी दस्तावेज भी भेजे और खुद को CBI अधिकारी बताते हुए पूरे परिवार को “डिजिटल अरेस्ट” में रहने का आदेश दिया। इसके बाद परिवार को लगातार वीडियो कॉल पर रखा गया और हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखी जाने लगी।

परिवार में कृषि मंत्रालय से सेवानिवृत्त अधिकारी, शहरी विकास मंत्रालय से सेवानिवृत्त उनकी बहन और एमबीबीएस छात्रा शामिल थीं। ठगों ने इन सभी को किसी से बात करने, फोन बंद करने या सामान्य जीवन जीने तक की अनुमति नहीं दी। लगातार निगरानी के कारण पूरा परिवार मानसिक रूप से टूटता चला गया।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि एमबीबीएस छात्रा को उसकी पढ़ाई और परीक्षा के दौरान भी वीडियो कॉल पर रखा गया। उसे कैमरे के सामने बैठकर पढ़ने के लिए मजबूर किया गया और परीक्षा केंद्र तक जाते समय भी ठग उसकी गतिविधियों पर नजर रखते रहे। इस दौरान छात्रा अत्यधिक मानसिक दबाव और डर में रही।

पांच दिनों तक यह स्थिति ऐसी रही जैसे पूरा परिवार अपने ही घर में कैद हो गया हो। रात के समय भी वीडियो कॉल चालू रहती थी, जिससे वे सो भी नहीं पा रहे थे और लगातार मानसिक तनाव झेल रहे थे। ठग बार-बार धमकी देते थे कि यदि कॉल डिस्कनेक्ट की गई तो गंभीर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

इस दौरान साइबर ठगों ने परिवार से करीब ₹3 लाख की ठगी कर ली। इसमें लगभग ₹1 लाख शहरी विकास मंत्रालय की सेवानिवृत्त अधिकारी के खाते से ट्रांसफर करवाया गया। हालांकि बैंक और साइबर सेल की त्वरित कार्रवाई के चलते करीब ₹2 लाख की राशि को होल्ड कर लिया गया, जिससे बड़ी वित्तीय हानि टल गई।

यह पूरा मामला 10 अप्रैल को तब सामने आया जब पड़ोसियों ने कई दिनों से फ्लैट में कोई हलचल नहीं देखी। संदेह होने पर एक पड़ोसी बहाने से फ्लैट में पहुंचा और अंदर की स्थिति देखकर तुरंत अन्य लोगों को सूचना दी। इसके बाद अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन (AOA) अध्यक्ष और सुरक्षा टीम मौके पर पहुंची।

जब दरवाजा नहीं खोला गया, तो उसे तोड़कर परिवार को बाहर निकाला गया। इसी दौरान वीडियो कॉल काट दी गई और इस “डिजिटल अरेस्ट” का भयावह सिलसिला समाप्त हुआ।

सूचना मिलने पर सेक्टर-113 पुलिस मौके पर पहुंची और पूरे मामले की जांच शुरू कर दी। पुलिस अब उन बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और डिजिटल ट्रांजैक्शन की जांच कर रही है जिनका इस्तेमाल इस ठगी में किया गया।

अधिकारियों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि CBI, ED या कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर पूछताछ नहीं करती और न ही किसी प्रकार की धनराशि की मांग करती है। ऐसे मामलों में तुरंत पुलिस को सूचना देना जरूरी है।

साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह ने इस तरह के मामलों पर चिंता जताते हुए कहा है कि “डिजिटल अरेस्ट” स्कैम अब एक संगठित मनोवैज्ञानिक अपराध का रूप ले चुका है। उनके अनुसार अपराधी डर, झूठे केस, और लगातार वीडियो निगरानी जैसे हथकंडों का इस्तेमाल कर पीड़ितों को पूरी तरह मानसिक रूप से नियंत्रित कर लेते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में जागरूकता, संदिग्ध कॉल पर तत्काल ब्रेक और परिवार के भीतर संवाद ही सबसे बड़ा बचाव है, क्योंकि अपराधी अक्सर पीड़ित को अलग-थलग कर ही अपने जाल में फंसाते हैं।

साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है और यह केवल वित्तीय धोखाधड़ी नहीं बल्कि एक गंभीर मानसिक प्रताड़ना का तरीका बन चुका है।

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