सुप्रीम कोर्ट: AI से फर्जी फैसलों पर तीखी टिप्पणी—न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता पर खतरा।

एआई से बने फर्जी फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, न्यायिक कदाचार की चेतावनी

Team The420
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न्यायिक प्रक्रिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। एक मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने निचली अदालत द्वारा कथित रूप से एआई से तैयार फर्जी या अस्तित्वहीन फैसलों पर भरोसा कर आदेश पारित करने पर गंभीर आपत्ति जताई। अदालत ने स्पष्ट कहा कि ऐसे कृत्य न केवल विधिक त्रुटि हैं, बल्कि परिस्थितियों के आधार पर न्यायिक कदाचार की श्रेणी में भी आ सकते हैं।

मामला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक निर्णय के खिलाफ दायर याचिका से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान पीठ के समक्ष यह मुद्दा उठा कि ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में जिन न्यायिक मिसालों का उल्लेख किया, वे वास्तविक रूप से अस्तित्व में नहीं थीं और कथित तौर पर एआई आधारित टूल के जरिए तैयार की गई थीं। इस पर अदालत ने गहरी चिंता व्यक्त की।

न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्न

सुनवाई कर रही पीठ ने कहा कि न्यायिक आदेश तथ्यों, साक्ष्यों और विधिक मिसालों के ठोस आधार पर ही पारित किए जाने चाहिए। यदि किसी न्यायालय द्वारा ऐसे निर्णयों का हवाला दिया जाता है जो अस्तित्व में ही नहीं हैं, तो यह न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा आघात है। अदालत ने टिप्पणी की कि “ट्रायल कोर्ट द्वारा एआई से तैयार गैर-मौजूद या कृत्रिम निर्णयों का उपयोग न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को प्रभावित करता है।”

पीठ ने यह भी कहा कि इस प्रकार के आदेशों के विधिक परिणाम हो सकते हैं। न्यायाधीशों की जिम्मेदारी है कि वे उद्धृत किए गए प्रत्येक निर्णय की प्रामाणिकता और प्रासंगिकता की जांच करें। केवल तकनीकी सुविधा या त्वरित संदर्भ के आधार पर किसी स्रोत को स्वीकार करना न्यायिक मानकों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

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संस्थागत स्तर पर चिंता

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल एक विवाद के गुण-दोष तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे न्यायिक निर्णय प्रक्रिया की पवित्रता और संस्थागत विश्वसनीयता का प्रश्न जुड़ा है। यदि एआई आधारित टूल्स के माध्यम से तैयार सामग्री का बिना सत्यापन उपयोग किया जाता है, तो इससे भविष्य में गंभीर विधिक जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं।

पीठ ने कहा कि इस विषय की विस्तृत पड़ताल आवश्यक है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि तकनीक का उपयोग न्यायिक कार्य में सहायक के रूप में हो, न कि भ्रामक सामग्री के स्रोत के रूप में। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि आवश्यकता पड़ने पर इस मुद्दे पर व्यापक दिशा-निर्देश तैयार किए जा सकते हैं।

शीर्ष विधि अधिकारियों से मांगा पक्ष

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को नोटिस जारी कर इस विषय पर अपना पक्ष रखने को कहा है। अदालत यह जानना चाहती है कि न्यायिक कार्य में एआई उपकरणों के उपयोग को लेकर किस प्रकार के मानक और निगरानी तंत्र विकसित किए जाने चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल संसाधनों और एआई टूल्स का उपयोग बढ़ने के साथ न्यायपालिका के सामने नई चुनौतियां उभर रही हैं। जहां एक ओर तकनीक त्वरित शोध और दस्तावेजीकरण में सहायक हो सकती है, वहीं बिना सत्यापन के उस पर निर्भरता गंभीर त्रुटियों को जन्म दे सकती है।

आगे की सुनवाई अहम

अदालत ने संकेत दिया है कि अगली सुनवाई में इस मुद्दे पर विस्तृत बहस हो सकती है। यदि यह पाया जाता है कि एआई से तैयार फर्जी निर्णयों का सचेत रूप से उपयोग किया गया, तो संबंधित पक्षों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता पारदर्शिता और सत्यापन पर आधारित होती है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती स्पष्ट संकेत देती है कि तकनीक के दौर में भी न्यायिक उत्तरदायित्व और विधिक मानकों से कोई समझौता स्वीकार्य नहीं होगा।

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