साइबर अपराधियों ने ऑनलाइन ठगी का एक नया और बेहद खतरनाक तरीका अपनाना शुरू कर दिया है, जिसे सुरक्षा विशेषज्ञ “बॉस स्कैम” के नाम से पहचान रहे हैं। इस धोखाधड़ी में अपराधी किसी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी, प्रबंध निदेशक, मुख्य कार्यकारी अधिकारी या अन्य शीर्ष प्रबंधन अधिकारियों की पहचान का इस्तेमाल कर कर्मचारियों को व्हाट्सऐप और अन्य मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए संपर्क करते हैं। इसके बाद तत्काल भुगतान, गिफ्ट कार्ड खरीदने, संवेदनशील दस्तावेज साझा करने या बैंकिंग विवरण उपलब्ध कराने का दबाव बनाया जाता है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह के हमलों में अपराधी पहले सोशल मीडिया, कॉर्पोरेट वेबसाइटों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध पेशेवर प्रोफाइल से अधिकारियों की जानकारी जुटाते हैं। इसके बाद वे किसी वरिष्ठ अधिकारी की प्रोफाइल फोटो और नाम का उपयोग कर नकली व्हाट्सऐप अकाउंट बनाते हैं। कई मामलों में कर्मचारियों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि अधिकारी किसी महत्वपूर्ण बैठक, यात्रा या गोपनीय कारोबारी कार्य में व्यस्त हैं और उन्हें तत्काल वित्तीय सहायता या भुगतान की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में अपराधी अक्सर मनोवैज्ञानिक दबाव और पदानुक्रम का लाभ उठाते हैं। कर्मचारी यह मानकर कि संदेश वास्तव में उनके वरिष्ठ अधिकारी ने भेजा है, बिना पर्याप्त सत्यापन के निर्देशों का पालन कर लेते हैं। कई कंपनियों में इस तरह की घटनाओं के कारण लाखों रुपये से लेकर करोड़ों रुपये तक की वित्तीय हानि की आशंका जताई गई है।
हाल के वर्षों में डिजिटल संचार पर बढ़ती निर्भरता ने इस तरह के अपराधों को और आसान बना दिया है। वर्क-फ्रॉम-होम, हाइब्रिड कार्य संस्कृति और विभिन्न शहरों तथा देशों में फैली टीमों के कारण कई बार कर्मचारियों के लिए संदेश की प्रामाणिकता की तुरंत पुष्टि करना कठिन हो जाता है। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर अपराधी नकली पहचान के जरिए भरोसा जीतने की कोशिश करते हैं।
साइबर सुरक्षा समुदाय का मानना है कि “बॉस स्कैम” पारंपरिक बिजनेस ईमेल कंप्रोमाइज (BEC) धोखाधड़ी का नया और अधिक व्यक्तिगत संस्करण है। पहले जहां अपराधी ईमेल के माध्यम से फर्जी निर्देश भेजते थे, वहीं अब व्हाट्सऐप जैसे लोकप्रिय प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रहे हैं, जहां संदेश अधिक तत्काल और विश्वसनीय प्रतीत होते हैं।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि यह हमला पूरी तरह सोशल इंजीनियरिंग पर आधारित होता है। उनके अनुसार, “साइबर अपराधी तकनीकी कमजोरियों से अधिक मानवीय विश्वास और संगठनात्मक संरचना का फायदा उठाते हैं। जब किसी कर्मचारी को उसके वरिष्ठ अधिकारी के नाम से संदेश मिलता है, तो वह स्वाभाविक रूप से निर्देशों का पालन करने की ओर झुकता है। यही मानसिकता अपराधियों का सबसे बड़ा हथियार बन जाती है।”
प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि किसी भी वित्तीय लेनदेन, बैंक खाते में राशि भेजने, गिफ्ट कार्ड खरीदने या गोपनीय जानकारी साझा करने से पहले स्वतंत्र सत्यापन अनिवार्य होना चाहिए। उन्होंने सलाह दी कि कंपनियां ऐसे मामलों में दोहरी या तिहरी मंजूरी प्रणाली अपनाएं ताकि केवल व्हाट्सऐप संदेश के आधार पर कोई वित्तीय निर्णय न लिया जा सके।
फ्यूचर क्राइम रिसर्च फाउंडेशन से जुड़े विशेषज्ञों का भी मानना है कि कॉर्पोरेट संस्थानों को नियमित साइबर जागरूकता प्रशिक्षण आयोजित करना चाहिए। कर्मचारियों को यह सिखाना आवश्यक है कि किसी भी असामान्य अनुरोध, विशेष रूप से तत्काल भुगतान या गोपनीय जानकारी से जुड़े निर्देशों को संदेह की दृष्टि से देखें और आधिकारिक चैनलों के माध्यम से पुष्टि करें।
विशेषज्ञों के अनुसार कंपनियों को मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, मजबूत पहचान सत्यापन प्रक्रिया, आंतरिक संचार प्रोटोकॉल और नियमित साइबर सुरक्षा ऑडिट जैसी व्यवस्थाओं को भी मजबूत करना चाहिए। इसके अलावा कर्मचारियों को यह स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि वरिष्ठ अधिकारी कभी भी केवल मैसेजिंग ऐप के माध्यम से संवेदनशील वित्तीय निर्देश जारी नहीं करेंगे।
डिजिटल युग में जहां संचार पहले से कहीं अधिक तेज और सुविधाजनक हो गया है, वहीं “बॉस स्कैम” जैसी धोखाधड़ियां यह भी दिखाती हैं कि साइबर अपराधी लगातार नए तरीके विकसित कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता, सत्यापन और मजबूत सुरक्षा प्रक्रियाएं ही इस बढ़ते खतरे से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय हैं।
