वाराणसी: वाराणसी पुलिस ने ट्रांजेक्शन एपीके (APK) फाइल और म्यूल बैंक खातों के जरिए देशभर में साइबर ठगी को अंजाम देने वाले एक अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश करते हुए आदर्श चौबे, आशीष यादव, सुजल सिंह, पीयूष सिंह और युवराज वर्मा को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया है कि आरोपी आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को पैसों का लालच देकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाते थे और बाद में उन खातों का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में लेकर देश-विदेश में सक्रिय साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराते थे।
पुलिस के अनुसार यह कार्रवाई 29 जुलाई को थाना साइबर क्राइम, कमिश्नरेट वाराणसी की टीम ने तकनीकी निगरानी और खुफिया सूचना के आधार पर की। गिरफ्तार आरोपियों में आदर्श चौबे निवासी मिर्जापुर (हाल निवासी वाराणसी), आशीष यादव निवासी आजमगढ़ (हाल निवासी वाराणसी), सुजल सिंह निवासी मुजफ्फरनगर (हाल निवासी वाराणसी), पीयूष सिंह निवासी मऊ (हाल निवासी वाराणसी) तथा युवराज वर्मा निवासी वाराणसी शामिल हैं। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि गिरोह सुनियोजित तरीके से म्यूल अकाउंट तैयार कर साइबर अपराध से अर्जित रकम को विभिन्न बैंक खातों के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का काम करता था। पुलिस अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य सदस्यों और संभावित विदेशी संपर्कों की तलाश में जुटी है।
छापेमारी के दौरान पुलिस ने आरोपियों के पास से 15 एंड्रॉयड मोबाइल फोन, तीन आईफोन, 43 एटीएम कार्ड, 12 पासबुक, 10 चेकबुक, 11 क्यूआर कोड, 12 सिम कार्ड, एक लैपटॉप, एक डायरी और ₹12,060 नकद बरामद किए। इसके अलावा महिंद्रा थार और हुंडई आई-20 कार भी जब्त की गई हैं। प्रारंभिक जांच के अनुसार इन वाहनों की खरीद कथित तौर पर साइबर अपराध से अर्जित धन से की गई थी और उनकी ईएमआई का भुगतान भी इसी रकम से किया जा रहा था।
जांच एजेंसियों के मुताबिक गिरोह पहले ऐसे लोगों को तलाशता था जिन्हें मामूली कमीशन या आर्थिक लाभ का लालच देकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाए जा सकें। खाते खुलने के बाद आदर्श चौबे, आशीष यादव, सुजल सिंह, पीयूष सिंह और युवराज वर्मा एटीएम कार्ड, पासबुक, चेकबुक, सिम कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग आईडी और पासवर्ड अपने कब्जे में ले लेते थे। इसके बाद खाताधारकों की भूमिका लगभग समाप्त हो जाती थी और पूरे बैंक खाते का संचालन गिरोह के सदस्य स्वयं करते थे। यही खाते आगे साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराए जाते थे, जिनका इस्तेमाल ऑनलाइन ठगी से प्राप्त धन को छिपाने और स्थानांतरित करने के लिए किया जाता था।
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पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि विदेशी साइबर अपराधियों से प्राप्त ट्रांजेक्शन एपीके फाइल संबंधित मोबाइल डिवाइस में इंस्टॉल कराई जाती थी। इसके जरिए बैंक खाते से जुड़े मोबाइल फोन पर रिमोट एक्सेस हासिल कर लेनदेन को नियंत्रित किया जाता था। ठगी की रकम पहले म्यूल खातों में मंगवाई जाती और फिर कई स्तरों पर अलग-अलग खातों में भेजकर मनी ट्रेल को जटिल बना दिया जाता था, ताकि जांच एजेंसियों के लिए धन के वास्तविक स्रोत और अंतिम लाभार्थी तक पहुंचना कठिन हो जाए।
पूछताछ में आदर्श चौबे, आशीष यादव, सुजल सिंह, पीयूष सिंह और युवराज वर्मा ने कथित तौर पर स्वीकार किया कि उन्हें साइबर अपराध से प्राप्त धनराशि पर लगभग 8 से 15 प्रतिशत तक कमीशन मिलता था, जिसे वे आपस में बांट लेते थे। पुलिस को आरोपियों के मोबाइल फोन और लैपटॉप से बैंक लेनदेन, संदिग्ध चैट, टेलीग्राम कम्युनिकेशन और अन्य महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य भी मिले हैं। इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को डिजिटल फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा जा रहा है ताकि गिरोह के अंतरराज्यीय और संभावित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का पता लगाया जा सके।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि म्यूल बैंक खाते आज संगठित साइबर अपराध का सबसे मजबूत आधार बन चुके हैं। उनके अनुसार साइबर अपराधी स्वयं अपने बैंक खातों का उपयोग करने के बजाय दूसरों के नाम पर खुले खातों के जरिए धन का प्रवाह करते हैं, जिससे जांच को भटकाने और मनी ट्रेल छिपाने में उन्हें मदद मिलती है। उन्होंने लोगों से अपील की कि किसी भी लालच में आकर अपना बैंक खाता, एटीएम कार्ड, पासबुक, चेकबुक, सिम कार्ड या इंटरनेट बैंकिंग संबंधी जानकारी किसी अन्य व्यक्ति को न सौंपें, क्योंकि ऐसा करना उन्हें भी कानूनी कार्रवाई के दायरे में ला सकता है।
पुलिस ने आदर्श चौबे, आशीष यादव, सुजल सिंह, पीयूष सिंह और युवराज वर्मा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 318(4), 61(2), 112 तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66सी और 66डी के तहत मामला दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। जांच एजेंसियां अब गिरोह के अन्य सदस्यों, विदेशी साइबर अपराधियों से संभावित संपर्क, डिजिटल ट्रेल, बैंकिंग नेटवर्क और मनी ट्रेल की गहन पड़ताल कर रही हैं। अधिकारियों का मानना है कि जांच आगे बढ़ने पर देश के विभिन्न राज्यों में दर्ज साइबर ठगी के कई मामलों से भी इस गिरोह के तार जुड़ सकते हैं।
