भोपाल: मध्य प्रदेश में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर गेहूं खरीद से जुड़े कथित बड़े घोटाले ने सरकारी खरीद व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में सामने आया है कि फर्जी किसान पंजीकरण के जरिए सरकारी खरीद केंद्रों पर गेहूं बेचा गया और भुगतान कथित तौर पर आरोपियों के नियंत्रण वाले बैंक खातों में पहुंचाया गया। प्रारंभिक जांच में भिंड और राजगढ़ जिलों में करोड़ों रुपये की वित्तीय अनियमितताओं के संकेत मिले हैं। राज्य सरकार ने मामले में विभागीय और आपराधिक कार्रवाई शुरू कर दी है, जबकि जांच एजेंसियां पूरे नेटवर्क की पड़ताल में जुटी हैं।
यह खुलासा ऐसे समय हुआ है जब हाल ही में राज्य सरकार ने इस वर्ष के गेहूं खरीद अभियान को रिकॉर्ड बताते हुए कहा था कि 13.41 लाख से अधिक किसानों से लगभग 1.042 करोड़ मीट्रिक टन गेहूं ₹2,585 प्रति क्विंटल की दर से खरीदा गया। हालांकि अब जांच एजेंसियों को संदेह है कि इस रिकॉर्ड खरीद का एक हिस्सा कथित रूप से फर्जी किसान पंजीकरण के जरिए बढ़ाया गया।
जांच अधिकारियों के अनुसार, कथित घोटाले को अंजाम देने के लिए राजस्व और खरीद व्यवस्था से जुड़े कुछ लोगों की मिलीभगत का संदेह है। किसान पंजीकरण की अंतिम तिथि 10 मार्च थी, लेकिन जांच में पाया गया कि बड़ी संख्या में आवेदन 5 से 10 मार्च के बीच, देर रात और तड़के के समय दर्ज किए गए। इससे पंजीकरण प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं।
प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि वास्तविक किसानों के खसरा नंबर और भूमि रिकॉर्ड का कथित तौर पर इस्तेमाल कर फर्जी किसान पंजीकरण तैयार किए गए। इनमें अनुसूचित जाति वर्ग के कुछ किसानों के रिकॉर्ड के इस्तेमाल की भी आशंका जताई गई है। नियमों के अनुसार प्रत्येक आवेदन का सत्यापन पटवारी और तहसीलदार द्वारा किया जाना था, लेकिन आरोप है कि कई पंजीकरण बिना पर्याप्त जांच के स्वीकृत कर दिए गए।
जांच एजेंसियों के मुताबिक, कई मामलों में जमीन किराये पर लेने से संबंधित आवश्यक दस्तावेज नहीं मिले। कुछ मामलों में गेहूं का पंजीकरण एक स्थान पर किया गया, जबकि उसकी तौल और खरीद दूसरे केंद्र पर दर्ज की गई। भूमि वास्तविक किसानों की थी, लेकिन सरकारी भुगतान कथित तौर पर ऐसे बैंक खातों में भेजा गया, जिनका संचालन फर्जी पंजीकरण कराने वाले लोगों द्वारा किया जा रहा था।
अधिकारियों का मानना है कि इस कथित घोटाले के पीछे पड़ोसी राज्यों और मध्य प्रदेश के MSP के बीच मूल्य अंतर एक प्रमुख कारण हो सकता है। आरोप है कि कम कीमत पर दूसरे राज्यों से गेहूं खरीदकर उसे मध्य प्रदेश में फर्जी किसान पहचान के जरिए MSP पर बेचा गया। राज्य में MSP के साथ अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि मिलने से आरोपियों ने कथित तौर पर करोड़ों रुपये का अवैध लाभ अर्जित किया।
भिंड जिले में जांच के बाद कई पटवारियों को निलंबित कर दिया गया है। जिला प्रशासन ने चार कथित फर्जी किसानों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है, जबकि जौरा और बनमोर के तहसीलदारों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। वहीं राजगढ़ जिले में प्रशासनिक जांच के बाद आठ सहकारी समिति प्रबंधकों और कंप्यूटर ऑपरेटरों को सेवा से हटा दिया गया है। उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। इसके अलावा राजस्व विभाग ने चार पटवारियों को निलंबित किया है और चार तहसीलदारों से स्पष्टीकरण मांगा है।
जांच एजेंसियां अब बैंक खातों, भूमि रिकॉर्ड, खरीद केंद्रों के दस्तावेजों और भुगतान से जुड़े वित्तीय लेनदेन की विस्तृत जांच कर रही हैं। यह भी पता लगाया जा रहा है कि कथित अनियमितताओं से सरकारी खजाने को वास्तविक रूप से कितना नुकसान हुआ और किन-किन लोगों ने इसका लाभ उठाया।
अधिकारियों का कहना है कि जांच अभी शुरुआती चरण में है और इसके दायरे में और सरकारी कर्मचारी, बिचौलिए तथा अन्य लाभार्थी भी आ सकते हैं। फिलहाल पूरे नेटवर्क की पहचान, दस्तावेजों के सत्यापन और सरकारी धन के कथित दुरुपयोग की जांच जारी है।
