वाराणसी: उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में पुलिस ने ‘ऑपरेशन साई वज्र’ के तहत कार्रवाई करते हुए कथित तौर पर ₹2 करोड़ से अधिक की साइबर ठगी से जुड़े तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच के अनुसार आरोपी म्यूल बैंक खातों के माध्यम से विभिन्न राज्यों में फैले साइबर ठगी नेटवर्क का संचालन कर रहे थे। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से विभिन्न बैंकों के एटीएम कार्ड, चार मोबाइल फोन और ₹24,880 नकद बरामद किए हैं। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान रोहित मौर्या, धीरेंद्र लाल बहादुर और सोनू कुमार के रूप में हुई है। तीनों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया।
जांच के अनुसार, ‘ऑपरेशन साई वज्र’ के तहत म्यूल खातों के सत्यापन के दौरान पुलिस को रामनगर क्षेत्र के भीटी निवासी रोहित मौर्या के बैंक खाते में संदिग्ध वित्तीय गतिविधियों की जानकारी मिली। प्रारंभिक जांच में पता चला कि खाते का इस्तेमाल विभिन्न साइबर धोखाधड़ी मामलों से जुड़ी रकम के लेनदेन के लिए किया जा रहा था। इसके बाद पुलिस ने संबंधित बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की निगरानी शुरू की, जिससे पूरे नेटवर्क के बारे में महत्वपूर्ण सुराग मिले।
डिजिटल निगरानी और तकनीकी विश्लेषण के आधार पर पुलिस को जानकारी मिली कि इस नेटवर्क में तीन लोग सक्रिय रूप से शामिल हैं। इसके बाद लंका मैदान क्षेत्र में घेराबंदी कर रोहित मौर्या, धीरेंद्र लाल बहादुर निवासी नालासोपारा (महाराष्ट्र) और सोनू कुमार निवासी शेखपुरा (बिहार) को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस के अनुसार, आरोपी कथित तौर पर क्षेत्र छोड़कर फरार होने की तैयारी में थे।
तलाशी के दौरान आरोपियों के पास से विभिन्न बैंकों के कई एटीएम कार्ड, चार मोबाइल फोन और ₹24,880 नकद बरामद किए गए। जब्त मोबाइल फोन और डिजिटल उपकरणों को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है। पुलिस कॉल डिटेल रिकॉर्ड, चैट, बैंकिंग एप्लिकेशन, यूपीआई लेनदेन और अन्य डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण कर रही है, ताकि नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों और वित्तीय लेनदेन की पूरी श्रृंखला का पता लगाया जा सके।
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पूछताछ में आरोपियों ने कथित तौर पर स्वीकार किया कि वे कमीशन के आधार पर लोगों से बैंक खाते खुलवाते थे। इसके बाद उन खातों की पासबुक, एटीएम कार्ड, चेकबुक और ओटीपी सहित बैंकिंग एक्सेस अपने कब्जे में ले लेते थे। इन खातों का इस्तेमाल साइबर ठगी से प्राप्त धनराशि को प्राप्त करने, अलग-अलग खातों में स्थानांतरित करने और आगे निकालने के लिए किया जाता था। जांच में यह भी सामने आया कि इस अवैध गतिविधि में शामिल प्रत्येक व्यक्ति का कमीशन पहले से तय रहता था।
प्रारंभिक जांच के अनुसार, आरोपी विभिन्न तरीकों से लोगों को साइबर ठगी का शिकार बनाते थे और ठगी से प्राप्त रकम को म्यूल खातों के माध्यम से कई चरणों में ट्रांसफर करते थे, ताकि वास्तविक लाभार्थियों की पहचान छिपी रहे। पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि इस नेटवर्क का संबंध अन्य राज्यों में सक्रिय साइबर अपराध गिरोहों से तो नहीं है।
जांच एजेंसियों का मानना है कि आरोपियों द्वारा इस्तेमाल किए गए बैंक खाते केवल धन के लेनदेन के लिए नहीं, बल्कि साइबर अपराध से अर्जित रकम को वैध दिखाने के उद्देश्य से भी उपयोग किए जा रहे थे। पुलिस अब बैंक खातों की केवाईसी जानकारी, लेनदेन का पैटर्न, मोबाइल रिकॉर्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की मदद से पूरे वित्तीय नेटवर्क की पड़ताल कर रही है।
साइबर अपराध विशेषज्ञों का कहना है कि म्यूल बैंक खाते आज साइबर अपराधियों का सबसे बड़ा हथियार बन चुके हैं। प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, लोग कमीशन के लालच में अपना बैंक खाता, एटीएम कार्ड, चेकबुक या ओटीपी किसी अन्य व्यक्ति को कभी न सौंपें। ऐसे खाते साइबर ठगी और मनी लॉन्ड्रिंग में इस्तेमाल हो सकते हैं, जिसके कारण खाताधारक भी कानूनी कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं। पुलिस मामले से जुड़े अन्य संदिग्धों की तलाश और डिजिटल वित्तीय नेटवर्क की जांच जारी रखे हुए है।
