कोच्चि: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सोमवार को केरल के त्रिप्रयार के निकट वालप्पाड स्थित एक निजी वित्तीय कंपनी की डिजिटल शाखा से कथित तौर पर ₹20 करोड़ की वित्तीय हेराफेरी के मामले में मुख्य आरोपी धन्या मोहन से पूछताछ की। केंद्रीय एजेंसी इस मामले में कथित मनी लॉन्ड्रिंग के पहलुओं की जांच कर रही है। यह जांच वालप्पाड पुलिस द्वारा दर्ज मूल आपराधिक मामले के आधार पर शुरू की गई है। ईडी कथित रूप से कंपनी के धन के गबन, विभिन्न बैंक खातों के माध्यम से धन के हस्तांतरण और कथित अपराध से अर्जित राशि से खरीदी गई संपत्तियों की जांच कर रही है।
अधिकारियों के अनुसार, धन्या मोहन करीब 18 वर्षों से कंपनी के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग से जुड़ी थीं और कथित घोटाला सामने आने के समय वह कंपनी की आईटी प्रोडक्ट एवं सर्विस डिवीजन में असिस्टेंट जनरल मैनेजर (एजीएम) एवं टेक लीड के पद पर कार्यरत थीं। जांच एजेंसियों का मानना है कि वरिष्ठ पद और डिजिटल वित्तीय प्रणालियों तक उनकी पहुंच का कथित तौर पर धन के अनधिकृत हस्तांतरण में उपयोग किया गया।
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जांच के अनुसार, कंपनी की डिजिटल इकाई से लगभग ₹20 करोड़ की राशि कथित रूप से पांच अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर की गई, जिनमें आरोपी के पिता और भाई के खाते भी शामिल बताए गए हैं। ईडी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि क्या इन लेनदेन को धन के वास्तविक स्रोत को छिपाने के उद्देश्य से योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया था और क्या इस कथित वित्तीय नेटवर्क में अन्य लोगों की भी भूमिका थी।
मामले का खुलासा अप्रैल 2024 में तब हुआ, जब कंपनी ने कथित तौर पर अपनी डिजिटल वित्तीय प्रणाली से ₹80 लाख की राशि धन्या मोहन के व्यक्तिगत बैंक खाते में स्थानांतरित होने का पता लगाया। इसके बाद कंपनी ने आंतरिक जांच कर वालप्पाड पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं और कंपनी के धन के कथित गबन का आरोप लगाया गया। शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
पुलिस के अनुसार, जांच टीम जब आरोपी के वालप्पाड स्थित किराये के आवास पर पहुंची, तब तक वह वहां से जा चुकी थीं। कुछ समय तक फरार रहने के बाद धन्या मोहन ने बाद में कोल्लम पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। पुलिस जांच के दौरान जुटाए गए वित्तीय रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों के आधार पर बाद में ईडी ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की।
जांच एजेंसियों को संदेह है कि कथित रूप से गबन की गई राशि का एक बड़ा हिस्सा आलीशान जीवनशैली अपनाने और रिश्तेदारों के नाम पर चल एवं अचल संपत्तियां खरीदने में खर्च किया गया। ईडी संपत्ति के दस्तावेजों, बैंक खातों और निवेश से जुड़े रिकॉर्ड की जांच कर यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि क्या ये संपत्तियां कथित अपराध से अर्जित धन से खरीदी गई थीं। इसके साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि क्या अन्य व्यक्तियों ने धन को छिपाने या स्थानांतरित करने में कोई भूमिका निभाई।
पुलिस जांच में पहले यह भी सामने आया था कि आरोपी कथित तौर पर ऑनलाइन रम्मी खेलने की आदी थीं। जांच एजेंसियां अब यह भी पता लगा रही हैं कि कहीं कथित रूप से गबन की गई राशि का उपयोग ऑनलाइन गेमिंग या उससे जुड़े वित्तीय लेनदेन में तो नहीं किया गया। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है और जांच जारी है।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि डिजिटल भुगतान प्रणालियों से जुड़े वित्तीय अपराधों में अक्सर आंतरिक पहुंच, कमजोर निगरानी व्यवस्था और अपर्याप्त नियंत्रण का दुरुपयोग किया जाता है। उनके अनुसार, बैंकिंग रिकॉर्ड, सर्वर लॉग, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और डिजिटल लेनदेन की फॉरेंसिक जांच से धन के प्रवाह का पता लगाने और सभी लाभार्थियों की पहचान करने में महत्वपूर्ण मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि बड़ी वित्तीय संस्थाओं को मजबूत एक्सेस कंट्रोल, रियल-टाइम फ्रॉड मॉनिटरिंग और नियमित डिजिटल ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं लागू करनी चाहिए ताकि अंदरूनी लोगों द्वारा किए जाने वाले वित्तीय अपराधों को रोका जा सके।
ईडी ने कहा कि मामले में मनी ट्रेल की विस्तृत जांच जारी है। एजेंसी कथित अपराध से जुड़े सभी लाभार्थियों की पहचान करने, धन शोधन की सीमा का पता लगाने और यह सत्यापित करने में जुटी है कि कहीं अन्य संपत्तियां भी कथित अवैध धन से तो नहीं खरीदी गईं। जांच के दौरान यदि किसी अन्य व्यक्ति या संस्था की संलिप्तता सामने आती है तो उनके विरुद्ध भी कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की जाएगी।
