यूपी पुलिस मुख्यालय ने ई-साक्ष्य में स्पष्ट आवाज, सही संदर्भ, व्यक्ति और वस्तु की पहचान तथा स्वतंत्र गवाहों के बयान दर्ज करने के निर्देश दिए हैं।

डिजिटल साक्ष्य अपलोड करने से काम पूरा नहीं, अदालत में प्रमाणिकता भी साबित करनी होगी; यूपी पुलिस ने कसे मानक

Team The420
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गोरखपुर। मुकदमों की विवेचना में डिजिटल साक्ष्यों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय ने उनकी गुणवत्ता, प्रासंगिकता और कानूनी स्वीकार्यता सुनिश्चित करने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। ई-साक्ष्य मोबाइल ऐप के माध्यम से एसआईडी में अपलोड किए जाने वाले वीडियो और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की अब नियमित निगरानी की जाएगी। मुख्यालय ने स्पष्ट किया है कि केवल बड़ी संख्या में वीडियो या डिजिटल साक्ष्य अपलोड करना पर्याप्त नहीं है। साक्ष्य स्पष्ट, प्रासंगिक, प्रमाणिक और न्यायालय में विधिक परीक्षण की कसौटी पर खरा उतरने योग्य होना चाहिए।

डीजीपी की ओर से जारी निर्देशों के मुताबिक, मुख्यालय स्तर पर गठित विधिक एवं तकनीकी समिति ने ई-साक्ष्य मॉनीटरिंग डैशबोर्ड के जरिए अलग-अलग जिलों में अपलोड किए गए एसआईडी की समीक्षा की। इस दौरान वीडियो रिकॉर्डिंग में कई ऐसी कमियां सामने आईं, जो मुकदमे की विवेचना और बाद में अभियोजन की स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं। समीक्षा में पाया गया कि कुछ वीडियो में केवल सुनसान या निर्जन स्थान रिकॉर्ड किए गए थे। उनमें न तो कोई कथन या उपयोगी ऑडियो था और न ही यह स्पष्ट किया गया था कि रिकॉर्डिंग किस विवेचनात्मक कार्रवाई या उद्देश्य से की जा रही है।

मुख्यालय ने ऐसी रिकॉर्डिंग को लेकर पुलिसकर्मियों को अधिक सावधानी बरतने के निर्देश दिए हैं। घटनास्थल की रिकॉर्डिंग करते समय कैमरे की स्थिति और दूरी का भी ध्यान रखना होगा। समीक्षा में कुछ ऐसे वीडियो मिले, जिनमें घटनास्थल को सड़क से काफी दूर से रिकॉर्ड किया गया था। वीडियो में पीड़ित या गवाह घटना से जुड़ी जानकारी दे रहे थे, लेकिन दूरी अधिक होने और आसपास वाहनों के शोर के कारण उनकी आवाज स्पष्ट रूप से सुनाई नहीं दे रही थी। इससे रिकॉर्ड किए गए कथन की उपयोगिता और प्रमाणिकता प्रभावित हो सकती है।

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कई मामलों में सड़क किनारे या भवन के आसपास मौजूद लोगों की रिकॉर्डिंग तो की गई, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि वे कौन हैं और घटना से उनका क्या संबंध है। मुख्यालय ने निर्देश दिया है कि महत्वपूर्ण गवाहों और संबंधित व्यक्तियों की पहचान तथा उनकी भूमिका को रिकॉर्डिंग के संदर्भ में स्पष्ट किया जाए। खासतौर पर स्वतंत्र गवाहों के बयान वीडियो या फोटो के माध्यम से दर्ज करने पर जोर दिया गया है, ताकि साक्ष्य संकलन केवल पुलिसकर्मियों के बयानों तक सीमित न रहे।

रात में की गई जब्ती और बरामदगी की वीडियो रिकॉर्डिंग में भी कमियां सामने आईं। कुछ मामलों में अभियुक्त कैमरे में स्पष्ट दिखाई दे रहा था, लेकिन बरामद की गई वस्तु को पर्याप्त नजदीक से रिकॉर्ड नहीं किया गया। इसके कारण वस्तु की पहचान, आकार और स्वरूप स्पष्ट नहीं हो पा रहा था। कुछ रिकॉर्डिंग में पृष्ठभूमि में अनावश्यक बातचीत और दूसरी आवाजें भी दर्ज थीं। मुख्यालय ने ऐसी परिस्थितियों में वीडियो रिकॉर्डिंग को अधिक स्पष्ट और केंद्रित रखने की आवश्यकता बताई है।

आर्म्स एक्ट से जुड़े कुछ मामलों में एफआईआर में दर्ज घटना के संक्षिप्त विवरण और जब्ती-बरामदगी के दौरान अभियुक्त के कथन के बीच भी अंतर पाया गया। मुख्यालय ने ऐसे विरोधाभासों को अभियोजन के लिए प्रतिकूल और डिजिटल साक्ष्य की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करने वाला माना है। इसलिए विवेचना के विभिन्न चरणों में दर्ज तथ्यों और डिजिटल रिकॉर्डिंग के बीच सामंजस्य बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं।

नई व्यवस्था के तहत ई-साक्ष्य की रिकॉर्डिंग शुरू करते समय वीडियो में उसके संदर्भ और उद्देश्य को स्पष्ट करना होगा। पुलिस मुख्यालय ने डिजिटल साक्ष्यों के संकलन, परीक्षण, अभिलेखीकरण, अपलोडिंग और पर्यवेक्षण के लिए एक समान मानक संचालन प्रक्रिया लागू करने के निर्देश दिए हैं। प्रत्येक वीडियो की मॉनीटरिंग भी की जाएगी, ताकि तकनीकी या प्रक्रियात्मक कमियों को समय रहते सुधारा जा सके।

पुलिस मुख्यालय का जोर इस बात पर है कि डिजिटल साक्ष्य केवल जांच का रिकॉर्ड न बने, बल्कि उसकी प्रमाणिकता और विश्वसनीयता भी स्थापित हो सके। रिकॉर्डिंग में घटना, व्यक्ति, वस्तु, स्थान और कार्रवाई का संदर्भ स्पष्ट होने से अदालत में उसके परीक्षण के दौरान साक्ष्य की उपयोगिता बढ़ सकती है। नई व्यवस्था के जरिए विवेचना में डिजिटल साक्ष्यों की गुणवत्ता और कानूनी स्वीकार्यता को एक समान मानकों के तहत सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है।

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