मेरठ/कानपुर: Telegram जैसे डिजिटल मंच का इस्तेमाल कर अवैध किडनी प्रत्यारोपण रैकेट चलाने का चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें एक एमबीए छात्र की किडनी मात्र ₹3.50 लाख में निकाल ली गई। पूरे नेटवर्क का खुलासा तब हुआ जब भुगतान और शर्तों को लेकर विवाद हुआ और मामला थाने तक पहुंच गया। जांच में Meerut और Kanpur के बीच फैले एक संगठित गिरोह की परतें खुल रही हैं, जिसमें निजी अस्पतालों और बिचौलियों की भूमिका भी सामने आ रही है।
मामले के केंद्र में मेरठ स्थित एक निजी अस्पताल से जुड़े तीन आरोपियों—डॉ. अफजल, डॉ. अमित और डॉ. वैभव मुदगल—के नाम सामने आए हैं, जो फिलहाल फरार बताए जा रहे हैं। आरोप है कि इनमें से एक ने टेलीग्राम चैनल के जरिए किडनी दाता की तलाश के लिए पोस्ट डाली थी। इसी माध्यम से बिहार के बेगूसराय निवासी आयुष, जो देहरादून में एमबीए अंतिम वर्ष का छात्र है, को संपर्क कर सौदे के लिए तैयार किया गया।
जांच में सामने आया कि आयुष को आर्थिक लालच देकर किडनी दान के लिए राजी किया गया। तय सौदे के अनुसार उसे ₹3.50 लाख देने की बात कही गई, जबकि वास्तविक बाजार में ऐसे अवैध सौदों में कहीं अधिक रकम ली जाती है। आरोप है कि दाता और प्राप्तकर्ता के बीच पूरी प्रक्रिया को छुपाने के लिए फर्जी दस्तावेज़ और चिकित्सकीय औपचारिकताओं का सहारा लिया गया।
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बताया गया है कि 29 मार्च को कानपुर के एक निजी अस्पताल में प्रत्यारोपण की प्रक्रिया पूरी की गई, जहां दिल्ली से आए डॉक्टरों की टीम ने ऑपरेशन किया। प्राप्तकर्ता मुजफ्फरनगर के मोरना क्षेत्र की रहने वाली पारुल बताई गई है। ऑपरेशन के बाद जब भुगतान और अन्य वादों को लेकर विवाद हुआ, तब पूरा मामला उजागर हो गया।
इस पूरे नेटवर्क की जांच में यह भी सामने आया है कि मेडिकल कॉलेजों के आसपास सक्रिय एजेंट मरीजों और उनके परिजनों को गुमराह कर निजी अस्पतालों में ले जाते हैं। वहां उन्हें सस्ते इलाज का झांसा दिया जाता है, लेकिन बाद में भारी रकम वसूली जाती है और कई मामलों में मरीजों के जीवन से खिलवाड़ तक किया जाता है। यह पैटर्न पहले भी सामने आ चुका है, जिससे संकेत मिलता है कि यह कोई एकल घटना नहीं बल्कि लंबे समय से चल रहा संगठित रैकेट है।
इसी अस्पताल से जुड़ा एक पुराना मामला भी चर्चा में है, जिसमें इलाज के नाम पर मरीज को बहला-फुसलाकर भर्ती किया गया और उससे अधिक पैसे वसूले गए। उस समय शिकायत के बाद अस्पताल का लाइसेंस निलंबित किया गया था, लेकिन बाद में जांच रिपोर्ट के आधार पर बहाल कर दिया गया। अब एक बार फिर उसी नेटवर्क के तार गंभीर आपराधिक गतिविधि से जुड़ते दिख रहे हैं।
इसके अलावा, किडनी प्रत्यारोपण के नाम पर ठगी का एक और मामला सामने आया था, जिसमें एक परिवार से ₹63 लाख की रकम ऐंठ ली गई थी। आरोप है कि बिचौलियों ने फर्जी दाता दिखाकर और प्रत्यारोपण की तारीख तय कर रकम कई खातों में हस्तांतरित कराई, लेकिन ऑपरेशन कभी नहीं हुआ। इस धोखाधड़ी के चलते मरीज की हालत बिगड़ती गई और अंततः उसकी मृत्यु हो गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल मंच और एन्क्रिप्टेड संदेश सेवा के जरिए ऐसे रैकेट चलाना अब आसान हो गया है। प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह कहते हैं कि “संगठित गिरोह अब सोशल इंजीनियरिंग और निजी जानकारी का इस्तेमाल कर कमजोर आर्थिक स्थिति वाले लोगों को निशाना बना रहे हैं। टेलीग्राम जैसे मंचों पर गुप्त चैनलों के जरिए अवैध गतिविधियों को अंजाम देना जांच एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।”
मामले के उजागर होने के बाद स्वास्थ्य सेवाओं और निजी अस्पतालों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। फिलहाल जांच एजेंसियां फरार आरोपियों की तलाश में जुटी हैं और पूरे नेटवर्क को खंगालने की कोशिश की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस रैकेट के तार किन-किन शहरों और राज्यों तक फैले हुए हैं।
