नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि गैरेज जैसी जगहों से संचालित होने वाले लॉ कॉलेजों को मान्यता दिया जाना अत्यंत चिंताजनक है। अदालत ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक लंबित आपराधिक मामले के आधार पर कानून स्नातक को अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत (एनरोल) करने से इनकार किया गया था। शीर्ष अदालत ने प्रथम दृष्टया बीसीआई के इस रुख पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि केवल आपराधिक मामला लंबित होना किसी व्यक्ति को स्वतः अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ कर रही थी। याचिकाकर्ता 50 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंट के.आर. सुदर्शन हैं, जिन्हें पुदुचेरी बार काउंसिल ने अधिवक्ता के रूप में नामांकन देने से इनकार कर दिया था। उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित है, जिसमें उन पर एक ऐसी कंपनी को पेशेवर सलाह देने का आरोप है, जो कथित वित्तीय अनियमितताओं में शामिल थी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत से अंतरिम राहत देने की मांग की। उनका तर्क था कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 24ए के तहत केवल किसी आपराधिक मामले के लंबित होने के आधार पर किसी व्यक्ति को अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। कानून में अयोग्यता का प्रावधान दोषसिद्धि जैसी परिस्थितियों से जुड़ा है, न कि केवल लंबित मुकदमे से।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि इसी वर्ष अप्रैल में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में सजा काट चुके एक दोषी व्यक्ति को भी अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत किया गया था। ऐसे में केवल लंबित मामले के आधार पर किसी कानून स्नातक को नामांकन से वंचित करना विधि के अनुरूप नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस तर्क पर भी विचार किया और बीसीआई के निर्णय के कानूनी आधार पर सवाल उठाए।
सुनवाई के दौरान जब बार काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि गंभीर आरोपों वाले व्यक्तियों का अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण चिंता का विषय है, तब न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि वास्तविक चिंता का विषय यह है कि बीसीआई ऐसे लॉ कॉलेजों को मान्यता दे रही है जो गैरेज जैसी जगहों से संचालित हो रहे हैं। अदालत ने यह भी कहा कि विधि शिक्षा की गुणवत्ता और मानकों को सुनिश्चित करना नियामक संस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
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पीठ ने संकेत दिया कि यदि विधि शिक्षा संस्थानों को निर्धारित मानकों के बिना मान्यता दी जाती है, तो इसका सीधा प्रभाव न्याय व्यवस्था और अधिवक्ता पेशे की गुणवत्ता पर पड़ता है। अदालत की टिप्पणियों से यह स्पष्ट हुआ कि केवल अधिवक्ताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि विधि शिक्षा की गुणवत्ता और नियामकीय व्यवस्था भी न्यायपालिका की चिंता का विषय है।
मामले के दौरान अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण से संबंधित निर्णय कानून के स्पष्ट प्रावधानों के अनुरूप होने चाहिए। यदि कानून केवल दोषसिद्धि की स्थिति में अयोग्यता निर्धारित करता है, तो लंबित मुकदमे के आधार पर अलग मानदंड अपनाने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार होना आवश्यक है।
इस कानूनी विवाद से जुड़ा व्यापक प्रश्न वर्तमान में मद्रास हाईकोर्ट के समक्ष भी विचाराधीन है, जहां इसे पांच न्यायाधीशों की बड़ी पीठ को भेजा गया है। बड़ी पीठ यह तय करेगी कि लंबित आपराधिक मामलों का अधिवक्ता के रूप में नामांकन पर क्या प्रभाव पड़ता है और संबंधित कानूनी प्रावधानों की व्याख्या किस प्रकार की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को विधि शिक्षा और अधिवक्ता पंजीकरण प्रणाली दोनों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नियामक संस्थाएं मान्यता, गुणवत्ता नियंत्रण और नामांकन प्रक्रिया में निर्धारित कानूनी मानकों का कड़ाई से पालन करें, तो इससे न केवल विधि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा बल्कि न्याय व्यवस्था में लोगों का विश्वास भी और मजबूत होगा।
