नई दिल्ली: ऑनलाइन अपराधों और गंभीर डिजिटल नुकसान से निपटने की व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जरूरी सुधारात्मक कदम उठाने को कहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मंगलवार को डिजिटल खतरों से जुड़ी जनहित याचिका का निपटारा करते हुए केंद्र और अन्य संबंधित हितधारकों को याचिकाकर्ता के 22 जून, 2026 के सुझाव पत्र में उठाए गए मुद्दों पर विचार करने का निर्देश दिया। याचिका में ऑनलाइन रेप और जान से मारने की धमकी, डॉक्सिंग, बच्चों की निजी जानकारी सार्वजनिक करने तथा बिना सहमति निजी, मॉर्फ्ड और डीपफेक कंटेंट प्रसारित किए जाने जैसे मामलों के लिए तेज और प्रभावी व्यवस्था की मांग की गई थी।
पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत के साथ जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना शामिल थे। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वकील नरेंद्र कुमार गोस्वामी ने डिजिटल अपराधों की तेजी और मौजूदा कानूनी कार्रवाई की गति के बीच अंतर को अदालत के सामने रखा। उन्होंने गंभीर ऑनलाइन खतरों से निपटने के लिए ऐसी व्यवस्था की जरूरत बताई, जिसमें पीड़ितों को तत्काल राहत मिल सके।
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रातोंरात ऑनलाइन हो सकता है गंभीर खतरा
सुनवाई के दौरान वकील ने उदाहरण देते हुए पूछा कि यदि किसी महिला के घर का पता रात में सोशल मीडिया पर दुष्कर्म की धमकी के साथ पोस्ट कर दिया जाए, तो क्या ऐसी सामग्री को ऑनलाइन रहने दिया जा सकता है। इस उदाहरण के जरिए याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने यह मुद्दा रखा कि गंभीर डिजिटल खतरे कई बार कुछ ही मिनटों में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकते हैं, जबकि पारंपरिक कानूनी प्रक्रियाओं में कार्रवाई में अधिक समय लग सकता है।
याचिका में इसी अंतर को दूर करने के लिए समय-सीमा वाली व्यवस्था बनाने की मांग की गई थी। इसमें विशेष रूप से ऐसे मामलों के लिए त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र का प्रस्ताव रखा गया था, जहां ऑनलाइन सामग्री से किसी व्यक्ति की शारीरिक सुरक्षा, प्रतिष्ठा, निजता या जीवन को तत्काल खतरा पैदा हो सकता है।
डॉक्सिंग और बच्चों की जानकारी भी दायरे में
याचिकाकर्ता ने डॉक्सिंग के मामलों को भी प्रस्तावित व्यवस्था में शामिल करने की मांग की थी। इसके तहत किसी व्यक्ति का घर का पता, फोन नंबर, संपर्क विवरण या लोकेशन जैसी निजी जानकारी बिना अनुमति सार्वजनिक किए जाने पर तत्काल कार्रवाई का सुझाव दिया गया।
बच्चों से संबंधित डिजिटल खतरों को लेकर भी चिंता जताई गई। याचिका में नाबालिगों के स्कूल का स्थान, पहचान या अन्य निजी जानकारी अनधिकृत रूप से ऑनलाइन साझा किए जाने को गंभीर डिजिटल नुकसान की श्रेणी में रखने की मांग की गई। ऐसे मामलों में विशेष रूप से तेज कार्रवाई की जरूरत बताई गई, क्योंकि संवेदनशील जानकारी के सार्वजनिक होने से बच्चों की सुरक्षा पर सीधा असर पड़ सकता है।
डीपफेक और बिना सहमति निजी कंटेंट पर भी नजर
याचिका में बिना सहमति अंतरंग, मॉर्फ्ड, सिंथेटिक या AI से तैयार किए गए आपत्तिजनक कंटेंट के प्रसार को लेकर भी तत्काल कार्रवाई की व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया गया। इसके साथ ही ऐसे डीपफेक और डिजिटल रूप से हेरफेर किए गए कंटेंट को भी शामिल करने की मांग की गई, जिसमें किसी व्यक्ति की पहचान या छवि का गलत इस्तेमाल कर उसे नुकसान पहुंचाया जाता है।
याचिकाकर्ता का जोर इस बात पर था कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री के प्रसार की गति को देखते हुए शिकायतों के निपटारे की प्रक्रिया भी उतनी ही तेज होनी चाहिए।
सुझाव पत्र तीन मंत्रालयों को भेजा गया था
सुप्रीम कोर्ट ने जब पूछा कि याचिकाकर्ता ने अपने सुझाव पहले कहां रखे थे, तो बताया गया कि 22 जून, 2026 को केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, गृह मंत्रालय तथा कानून और न्याय मंत्रालय को प्रतिनिधित्व भेजा गया था।
अदालत ने कहा कि याचिका में साइबर अपराधों के विभिन्न तरीकों और पहलुओं को प्रभावी ढंग से सामने रखा गया है। हालांकि, इनके तकनीकी और व्यावहारिक समाधान से जुड़े मुद्दों पर संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों की राय महत्वपूर्ण होगी।
सेंसरशिप नहीं, लक्षित कार्रवाई की मांग
याचिका में स्पष्ट किया गया था कि प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य इंटरनेट पर व्यापक सेंसरशिप लागू करना नहीं है। मांग केवल गंभीर और गैर-कानूनी डिजिटल कंटेंट के खिलाफ URL-विशिष्ट तथा कंटेंट-विशिष्ट कार्रवाई की थी। याचिकाकर्ता ने ऐसी कार्रवाई को समयबद्ध, तर्कसंगत और कानूनी या न्यायिक निगरानी के अधीन रखने का सुझाव दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल याचिका का निपटारा करते हुए संबंधित अधिकारियों और अन्य हितधारकों को सुझाव पत्र में उठाए गए मुद्दों पर विचार करने तथा आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने का निर्देश दिया है। इससे गंभीर ऑनलाइन अपराधों से निपटने के लिए केंद्र की मौजूदा व्यवस्था में संभावित सुधारों पर आगे काम का रास्ता खुल सकता है।
