बेंच ने कहा—धोखाधड़ी या प्रशासनिक लापरवाही से खाली हुई MBBS सीटें अगली योग्य उम्मीदवार को दी जाएं

सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल सीटों को बताया राष्ट्रीय संसाधन, NEET फ्रॉड मामले में दाखिले को दी मंजूरी

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By Roopa
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा है कि सरकारी मेडिकल संस्थानों की सीटें “राष्ट्रीय संसाधन” हैं और इन्हें किसी भी स्थिति में खाली नहीं छोड़ा जाना चाहिए, खासकर तब जब वे धोखाधड़ी या प्रशासनिक देरी के कारण रिक्त होती हैं। कोर्ट ने यह टिप्पणी NEET-UG से जुड़े एक मामले में की, जिसमें फर्जी दस्तावेजों के आधार पर किए गए दाखिलों को रद्द कर दिया गया था और बाद में सीटों के आवंटन पर विवाद उत्पन्न हुआ था।

यह फैसला उस मामले में आया जिसमें हिमाचल प्रदेश के दो सरकारी मेडिकल कॉलेजों की MBBS सीटें तब खाली हो गई थीं जब जांच में यह सामने आया कि दो छात्रों ने फर्जी मार्कशीट के आधार पर प्रवेश लिया था। उनकी एडमिशन रद्द होने के बाद यह कानूनी सवाल उठा कि काउंसलिंग की समयसीमा खत्म होने के बाद क्या खाली सीटें भरी जा सकती हैं या नहीं।

फर्जी दाखिलों से खाली हुईं सीटें

मामले के अनुसार, NEET-UG 2022 काउंसलिंग के दौरान दो छात्रों को शिमला स्थित Pt. Jawahar Lal Nehru Government Medical College और Indira Gandhi Medical College में प्रवेश दिया गया था। बाद में सत्यापन में पता चला कि उनके स्कोरकार्ड और दस्तावेज फर्जी थे और NMC पोर्टल पर उपलब्ध रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते थे।

इसके बाद Atal Medical and Research University ने अधिकारियों को सूचित किया कि दोनों कॉलेजों में एक-एक सीट खाली हो गई है और इन्हें जल्द भरने की अनुमति दी जाए।

हालांकि National Medical Commission (NMC) ने कई महीनों बाद यह कहा कि काउंसलिंग प्रक्रिया पहले ही समाप्त हो चुकी है, इसलिए तय समयसीमा के बाद किसी भी प्रकार का प्रवेश संभव नहीं है।

छात्रा ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया

मेरिट/वेटिंग लिस्ट में शामिल और NEET-UG 2022 में 508 अंक प्राप्त करने वाली एक छात्रा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर खाली सीट पर दाखिले की मांग की। उसका तर्क था कि वह योग्य उम्मीदवार है और उसे प्रशासनिक देरी और धोखाधड़ी की समय पर पहचान न होने की वजह से नुकसान नहीं होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए छात्रा को अगले शैक्षणिक वर्ष में दाखिला देने और मुआवजा देने का आदेश दिया था। इस आदेश को NMC ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: देरी और मेरिट का संतुलन

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि छात्रा ने खाली सीट की जानकारी मिलने के बाद समय पर आवेदन किया था। कोर्ट ने यह भी माना कि फर्जी दस्तावेजों की पहचान और संबंधित संस्थानों की ओर से संचार में हुई देरी पूरी तरह प्रशासनिक विफलता थी।

कोर्ट ने पहले के फैसलों—Asha बनाम Pt. B.D. Sharma University और S. Krishna Sradha बनाम आंध्र प्रदेश राज्य—का हवाला देते हुए कहा कि विशेष परिस्थितियों में न्याय और समानता (equity) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

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“सीटें बर्बाद नहीं की जा सकतीं”: सुप्रीम कोर्ट

अपने अहम अवलोकन में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी मेडिकल सीटें केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं हैं, बल्कि यह देश की सार्वजनिक संपत्ति हैं, जिन्हें जनहित में उपयोग किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि यदि कोई सीट धोखाधड़ी के कारण खाली होती है, तो प्रशासन का दायित्व है कि उसे मेरिट सूची में अगले योग्य उम्मीदवार को दिया जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण सीटों का खाली रह जाना NEET-UG परीक्षा के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है।

काउंसलिंग शेड्यूल मेरिट से ऊपर नहीं

NMC की दलील पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि काउंसलिंग की समयसीमा महत्वपूर्ण है, लेकिन विशेष परिस्थितियों में यह मेरिट और न्याय से ऊपर नहीं हो सकती। जहां देरी संस्थागत विफलता के कारण हुई हो, वहां अगले उपलब्ध शैक्षणिक सत्र में प्रवेश दिया जाना उचित है।

अंतिम फैसला और महत्व

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए छात्रा को राहत दी, लेकिन दाखिले का वर्ष संशोधित करते हुए उसे 2026–2027 सत्र में प्रवेश देने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण छात्रा को वर्षों तक इंतजार करना पड़ा, जो न्याय के उद्देश्य के अनुरूप नहीं है।

यह फैसला इस बात को मजबूत करता है कि शैक्षणिक मेरिट की रक्षा की जानी चाहिए और मेडिकल शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक संसाधनों का अधिकतम और निष्पक्ष उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

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