New Delhi: दक्षिण कोरिया के एक पूर्व विश्वविद्यालय प्रोफेसर को अपनी बेटी के प्रतिष्ठित डेंटल स्कूल में दाखिले के लिए छात्रों से शोधकार्य करवाने और उनके काम का श्रेय बेटी को दिलाने के मामले में 3.6 वर्ष की जेल की सजा सुनाई गई है। दक्षिण कोरिया के सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए माना कि प्रोफेसर ने अपने पद का दुरुपयोग कर शैक्षणिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
मामला सियोल स्थित निजी विश्वविद्यालय संगक्युनक्वान यूनिवर्सिटी के फार्मेसी स्कूल के पूर्व प्रोफेसर ली एम (Lee M) से जुड़ा है। दक्षिण कोरियाई मीडिया के अनुसार घटनाक्रम वर्ष 2012 में शुरू हुआ, जब उनकी बेटी हाई स्कूल के दूसरे वर्ष में पढ़ रही थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार प्रोफेसर ने अपनी प्रयोगशाला में कार्यरत छात्रों को वे पशु-आधारित प्रयोग करने के लिए कहा, जिन्हें उनकी बेटी को स्वयं करना था। छात्रों ने प्रयोग पूरे किए और सम्मेलन में प्रस्तुत किए जाने वाले शोध प्रतिवेदन भी तैयार किए।
जांच में सामने आया कि सम्मेलन में प्रस्तुत इसी शोध के आधार पर प्रोफेसर की बेटी को पुरस्कार मिला। बाद में इसी उपलब्धि का उपयोग कर उसे विश्वविद्यालय के “साइंस टैलेंट स्पेशल एडमिशन” कार्यक्रम के तहत प्रवेश प्राप्त हुआ। अधिकारियों का आरोप है कि यह पूरी उपलब्धि छात्रों के वास्तविक शोध कार्य पर आधारित थी, जबकि उसका श्रेय बेटी को दिया गया।
अभियोजन के अनुसार वर्ष 2016 में भी प्रोफेसर ने अपनी बेटी के स्नातक अनुसंधान कार्यक्रम के आवेदन के लिए छात्रों से लगभग तीन महीने तक “तनाव-प्रेरित पशु प्रयोग” (Stress-Induced Animal Experiments) करवाए। इस दौरान बेटी प्रयोगशाला में केवल दो या तीन बार निरीक्षण के लिए पहुंची, जबकि अधिकांश वैज्ञानिक कार्य छात्रों ने किया। इसी अवधि में वह कनाडा में एक्सचेंज स्टूडेंट कार्यक्रम में भी शामिल रही।
जांच एजेंसियों का आरोप है कि जब प्रयोगों के परिणाम प्रारंभिक परिकल्पना के अनुरूप नहीं आए तो प्रोफेसर ने छात्रों को शोध डेटा में हेरफेर करने का निर्देश दिया। बाद में संशोधित शोधपत्र बेटी के नाम से प्रस्तुत किया गया और उसे एक अन्य पुरस्कार भी मिला। रिपोर्टों के अनुसार एक छात्र ने शोधपत्र का ब्रेल भाषा में अनुवाद करने के लिए 54 घंटे तक काम किया, जबकि अंतिम प्रकाशन में बेटी को एकमात्र लेखक (Sole Author) के रूप में दर्शाया गया।
वर्ष 2018 में यही शोधपत्र और अन्य दस्तावेज सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के डेंटल स्कूल में प्रवेश के लिए जमा किए गए। वर्ष 2019 में इस कथित अनियमितता की शिकायत शिक्षा मंत्रालय को मिली, जिसके बाद विशेष जांच शुरू की गई। जांच पूरी होने पर प्रोफेसर और उनकी बेटी दोनों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया।
प्रथम अदालत ने वर्ष 2024 में प्रोफेसर को 3.6 वर्ष की जेल की सजा सुनाई थी, जबकि उनकी बेटी को 10 महीने की जेल तथा दो वर्ष के लिए विश्वविद्यालय से निलंबित करने का आदेश दिया गया था। प्रोफेसर ने फैसले को चुनौती देते हुए अपील की और लगभग 125 मिलियन कोरियाई वॉन की प्रतिपूर्ति व जुर्माना भी जमा किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के निर्णय को सही ठहराते हुए सजा बरकरार रखी।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि प्रोफेसर की पत्नी ने भी कुछ प्रयोगों के आंकड़ों में बदलाव कर परिकल्पना के पक्ष में परिणाम दिखाने के निर्देश दिए थे। अधिकारियों का मानना है कि यह मामला शैक्षणिक ईमानदारी, शोध नैतिकता और विश्वविद्यालय प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों के अनुसार अदालत का यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि शैक्षणिक उपलब्धियों में धोखाधड़ी, शोध डेटा में हेरफेर और छात्रों के कार्य का अनुचित उपयोग करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
