नई दिल्ली: भारत के कॉर्पोरेट धोखाधड़ी जांच एजेंसी SFIO (सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस) ने इंडस्ट्रियल फाइनेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (IFCI) में पिछले 15 वर्षों की प्रणालीगत ऋण असंगतियों की जांच और तेज कर दी है। यह मामला कुल ₹6,855 करोड़ के संभावित ऋण घोटाले से जुड़ा है, जो कई कार्यकालों में फैला हुआ है। SFIO ने इस संबंध में कंपनी याचिका CP/34/PB/2026 राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) में दाखिल की है। याचिका में IFCI, इसके वरिष्ठ अधिकारी और कई कॉर्पोरेट उधारकर्ताओं को प्रतिवादी बनाया गया है।
तीन पूर्व CMDs पर विशेष नजर
जांच में विशेष रूप से तीन पूर्व IFCI चेयरमैन और प्रबंध निदेशकों को संदेह के दायरे में रखा गया है:
- संतोष नायर
- मालय मुखर्जी
- अतुल कुमार राय
तीनों CMDs का एक ही जांच में शामिल होना असामान्य है। यह संकेत देता है कि समस्या सिर्फ किसी एक कार्यकाल की चूक नहीं बल्कि लंबे समय तक चली शासन और जवाबदेही की खामियों को दर्शाती है।
मामले का पूरा परिदृश्य
कंपनी याचिका 24 जनवरी 2026 को दर्ज की गई थी और इसे NCLT ने प्रारंभिक स्तर पर स्वीकार कर लिया है। याचिका में 90 से अधिक व्यक्तियों और संस्थाओं को प्रतिवादी बनाया गया है, जो जांच की जटिलता और व्यापकता को दर्शाता है।
SFIO कार्रवाई के कारण
याचिका के अनुसार, IFCI की मूलभूत ऋण प्रक्रियाओं में कई गंभीर चूकें पाई गईं:
- ड्यू डिलिजेंस मानकों का ठीक से पालन नहीं किया गया
- मूल्यांकन और जोखिम आकलन प्रक्रियाएं संदिग्ध थीं
- आंतरिक अनुमोदन प्रणालियों में अनियमितताएं हुईं
इन चूकों के कारण बुरी ऋण राशि का ढेर बन गया, जिससे वित्तीय प्रणाली पर गंभीर दबाव पड़ा और संस्थागत शासन पर सवाल उठे।
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जांच में शामिल कॉर्पोरेट नाम
कई बड़ी और जानी-मानी कंपनियां जांच के दायरे में हैं, जिनमें से कई पहले वित्तीय संकट या दिवालियापन प्रक्रिया से गुज़री हैं:
- ब्लू कोस्ट होटल्स
- अमटेक ऑटो
- आलोक इंडस्ट्रीज
- भूषण स्टील
- जयपी इन्फ्राटेक
- ABG शिपयार्ड
- पिपावाव डिफेंस
इन कंपनियों की जांच यह स्पष्ट करती है कि ऋण मंजूरी के समय उनकी क्रेडिट योग्यता का मूल्यांकन कैसे किया गया, इस पर गंभीर सवाल उठते हैं।
जांच का व्यापक दायरा
यह जांच केवल कॉर्पोरेट उधारकर्ताओं तक सीमित नहीं है। इसमें वर्तमान और पूर्व IFCI अधिकारी, वरिष्ठ प्रबंधन और बोर्ड-स्तरीय अधिकारी भी शामिल हैं। कुल मिलाकर 90 से अधिक प्रतिवादी की पहचान की गई है।
जांचकर्ता यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या ऋण निर्णयों में गुप्त सांठगांठ या मानकों की जानबूझकर अवहेलना हुई। SFIO का उद्देश्य सभी जिम्मेदार पक्षों को दायरे में लाना और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
संभावित प्रभाव
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मामला भारत में वित्तीय भ्रष्टाचार के विरासत वाले मामलों की जांच में मील का पत्थर बन सकता है। यदि आरोप साबित होते हैं, तो यह वित्तीय संस्थानों में शासन और जवाबदेही मानकों को पूरी तरह नया आकार दे सकता है।
आगामी NCLT सुनवाइयां तय करेंगी कि जांच कितनी गहरी और व्यापक होगी, और कौन-कौन से अधिकारी या कंपनियां इसके दायरे में आएंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह जांच संस्थानिक पारदर्शिता और निवेशक विश्वास पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है।
निष्कर्ष
IFCI में 15 वर्षों की प्रणालीगत चूक और ₹6,855 करोड़ के ऋण घोटाले की जांच न केवल वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल उठाती है, बल्कि दीर्घकालीन शासन और जवाबदेही की खामियों के गंभीर परिणाम भी उजागर करती है। SFIO ने आश्वासन दिया है कि जांच तेज गति से होगी और सभी संभावित जिम्मेदारों को दायरे में लाया जाएगा।
यह मामला पूरे वित्तीय क्षेत्र की नजर में है, क्योंकि यह बड़े पैमाने पर संस्थागत ऋण विफलताओं के समाधान के लिए भविष्य में मार्गदर्शन तय कर सकता है और ड्यू डिलिजेंस व आंतरिक नियंत्रणों का पालन और मजबूत कर सकता है।
