सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को कथित तौर पर ₹7,623 करोड़ का नुकसान पहुंचाने वाले बहुचर्चित बैंक धोखाधड़ी मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए रिलायंस समूह की दो वित्तीय कंपनियों के पूर्व शीर्ष अधिकारियों को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसी ने रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड (RCFL) के पूर्व निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी देवांग मोदी तथा रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड (RHFL) के पूर्व कार्यकारी निदेशक एवं सीईओ रविंद्र सुधालकर को अलग-अलग मामलों में हिरासत में लिया है।
सीबीआई के अनुसार दोनों मामलों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को कुल ₹7,623 करोड़ का कथित नुकसान हुआ है। इनमें आरसीएफएल से जुड़े मामले में 13 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को लगभग ₹4,097 करोड़ का नुकसान पहुंचने का आरोप है, जबकि आरएचएफएल से जुड़े मामले में 10 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को लगभग ₹3,526 करोड़ की कथित हानि हुई।
जांच एजेंसी का आरोप है कि दोनों अधिकारी अपनी-अपनी कंपनियों में महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले पदों पर थे और ऋण स्वीकृति से जुड़े प्रमुख फैसलों में उनकी केंद्रीय भूमिका थी। सीबीआई का दावा है कि कंपनी संचालन की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने ऐसी मध्यस्थ और कथित कंडुइट कंपनियों को ऋण मंजूर किए, जो नियामकीय दिशानिर्देशों और उधारी की शर्तों के अनुरूप नहीं थे।
जांच में सामने आया है कि देवांग मोदी अप्रैल 2017 से दिसंबर 2018 तक आरसीएफएल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रहे। सीबीआई का आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान ऐसे ऋण स्वीकृत किए गए जो भारतीय रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लिए गए वित्तीय संसाधनों के उपयोग संबंधी शर्तों के विपरीत थे। एजेंसी का कहना है कि ऋण वितरण की प्रक्रिया में जोखिम मूल्यांकन और नियामकीय अनुपालन से जुड़े कई सवाल उठे हैं।
इसी तरह, रविंद्र सुधालकर अक्टूबर 2016 से मार्च 2022 तक आरएचएफएल में कार्यकारी निदेशक और सीईओ के पद पर रहे। सीबीआई के अनुसार उनके कार्यकाल में भी ऐसी संस्थाओं को ऋण दिए गए जो कंपनी की आंतरिक ऋण नीतियों, राष्ट्रीय आवास बैंक और भारतीय रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों तथा बैंकों से प्राप्त उधार की शर्तों के अनुरूप नहीं थे।
जांच एजेंसी का आरोप है कि आरसीएफएल और आरएचएफएल द्वारा प्राप्त धनराशि का एक हिस्सा कथित रूप से अन्य संबद्ध कंपनियों की ओर मोड़ा गया। सीबीआई के अनुसार इन फंड्स को रिलायंस एडीए समूह की विभिन्न कंपनियों तक पहुंचाया गया, जिससे ऋणदाताओं को भारी वित्तीय नुकसान हुआ। एजेंसी का दावा है कि इस कथित फंड डायवर्जन के कारण बैंकों को हजारों करोड़ रुपये की हानि हुई, जबकि संबंधित संस्थाओं और लाभार्थियों को अनुचित वित्तीय लाभ मिला।
मामले की जांच के दौरान सीबीआई ने विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) से प्राप्त शिकायतों के आधार पर कई प्राथमिकी दर्ज की हैं। इनमें रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड, रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड, रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड और रिलायंस टेलीकॉम लिमिटेड से जुड़े मामले शामिल हैं। एजेंसी इन मामलों में ऋण स्वीकृति, धन के उपयोग, संबंधित पक्षों को भुगतान और फंड ट्रेल की विस्तृत जांच कर रही है।
सूत्रों के अनुसार जांच में बैंकिंग रिकॉर्ड, वित्तीय दस्तावेज, कॉर्पोरेट लेनदेन और विभिन्न कंपनियों के बीच हुए धन हस्तांतरण की पड़ताल की जा रही है। जांच एजेंसियां यह समझने का प्रयास कर रही हैं कि ऋण राशि का अंतिम उपयोग किन उद्देश्यों के लिए किया गया और क्या धन के प्रवाह में किसी प्रकार की सुनियोजित वित्तीय अनियमितता शामिल थी।
वित्तीय अपराध मामलों के जानकारों का मानना है कि यह मामला भारत के प्रमुख कॉर्पोरेट ऋण विवादों में से एक माना जा रहा है, जिसमें बैंकिंग प्रणाली, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और नियामकीय अनुपालन से जुड़े गंभीर प्रश्न उठे हैं। सीबीआई ने संकेत दिया है कि जांच अभी जारी है और उपलब्ध साक्ष्यों, फंड ट्रेल तथा अन्य संबंधित दस्तावेजों के आधार पर आगे भी कार्रवाई की जा सकती है।
