देशभर में भर्ती और परीक्षा अनियमितताओं से जुड़े 158 मामलों में CBI जांच पूरी होने के बावजूद ट्रायल शुरू नहीं हो सका है।

देशभर में भर्ती परीक्षा घोटालों के 158 मामलों का ट्रायल अब भी लंबित, नए फास्ट-ट्रैक कानून के तहत सीबीआई करेगी स्थानांतरण की पहल

Team The420
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नई दिल्ली: देशभर में भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं से जुड़े 158 मामलों में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की जांच पूरी होने के बावजूद अब तक अदालतों में ट्रायल शुरू नहीं हो सका है। इनमें कुछ मामले दो दशक से भी अधिक पुराने बताए जा रहे हैं। ऐसे में हाल ही में पारित सार्वजनिक परीक्षाएं (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन अधिनियम, 2026 के तहत गठित की जा रही विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों में इन मामलों को स्थानांतरित कराने के लिए सीबीआई देशभर के विभिन्न उच्च न्यायालयों का रुख करेगी। एजेंसी का मानना है कि लंबित मामलों के शीघ्र निस्तारण से भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया दोनों को मजबूती मिलेगी।

सूत्रों के अनुसार सीबीआई संबंधित उच्च न्यायालयों से अनुरोध करेगी कि जिन मामलों की जांच पूरी हो चुकी है और जिनमें आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं, उन्हें विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों में स्थानांतरित किया जाए। एजेंसी प्रत्येक मामले की प्रभावी पैरवी के लिए विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि अभियोजन पक्ष के पास सुनवाई को समयबद्ध ढंग से पूरा कराने के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध हों। इसका उद्देश्य वर्षों से लंबित भर्ती घोटालों के मामलों में शीघ्र न्यायिक प्रक्रिया सुनिश्चित करना है।

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उपलब्ध जानकारी के अनुसार दिल्ली में ऐसे लगभग 25 मामले लंबित हैं, जिनमें सीबीआई जांच पूरी कर चुकी है लेकिन ट्रायल शुरू नहीं हो पाया। इनमें वर्ष 2010-11 की एम्स पीजी भर्ती परीक्षा, 2011 की दिल्ली विश्वविद्यालय मेडिकल एवं डेंटल प्रवेश परीक्षा, वर्ष 2004 की कॉमन एडमिशन टेस्ट (कैट), वर्ष 2013 की कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) भर्ती परीक्षा तथा शिक्षक भर्ती से जुड़े कथित अनियमितता के मामले शामिल हैं।

बिहार में पांच मामले लंबित बताए गए हैं, जिनमें तीन मामले कथित नीट-2024 पेपर लीक से संबंधित हैं। इसके अतिरिक्त वर्ष 2003 और 2011 की प्री-मेडिकल टेस्ट (पीएमटी) परीक्षा से जुड़े मामले भी शामिल हैं। हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2022 पुलिस कांस्टेबल भर्ती सहित तीन मामले ट्रायल की प्रतीक्षा में हैं, जबकि जम्मू-कश्मीर में जूनियर इंजीनियर और कांस्टेबल भर्ती में कथित अनियमितताओं से जुड़े तीन मामले लंबित हैं। इसी प्रकार झारखंड और कर्नाटक में पांच-पांच, महाराष्ट्र में तीन, राजस्थान में आठ, तमिलनाडु में 14 तथा उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 10-10 मामले अभी भी ट्रायल शुरू होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि ट्रायल में लंबे समय तक होने वाली देरी से अभियोजन की सफलता प्रभावित हो सकती है। समय बीतने के साथ गवाहों की उपलब्धता कम हो जाती है, कई गवाह वृद्ध हो जाते हैं या उनका पता लगाना कठिन हो जाता है। इसके अलावा घटनाओं से जुड़ी यादें धुंधली पड़ने लगती हैं, गवाही में बदलाव की संभावना बढ़ जाती है और आरोपियों की पहचान से जुड़े तथ्य भी कमजोर हो सकते हैं। अधिकारियों का मानना है कि यदि समय पर सुनवाई नहीं हुई तो कुछ मामलों में अभियोजन पक्ष की स्थिति प्रभावित हो सकती है।

अधिकारियों ने यह भी बताया कि जांच अधिकारियों, सरकारी वकीलों और न्यायिक अधिकारियों के लगातार स्थानांतरण से भी मामलों की सुनवाई प्रभावित होती है। नए अधिकारी के आने पर पुराने रिकॉर्ड और तथ्यों को समझने में अतिरिक्त समय लगता है, जिससे मुकदमों के निस्तारण में और विलंब होता है। इसी चुनौती को देखते हुए केंद्र सरकार ने नए कानून के माध्यम से विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों की व्यवस्था लागू की है।

हाल ही में संसद से पारित सार्वजनिक परीक्षाएं (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन अधिनियम, 2026 के तहत प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर एक सत्र न्यायालय को विशेष फास्ट-ट्रैक अदालत के रूप में नामित किया जाएगा। कानून के अनुसार इन अदालतों में मामलों की प्रतिदिन सुनवाई होगी, अनावश्यक स्थगन से बचा जाएगा तथा आरोपपत्र दाखिल होने के तीन महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। यदि किसी मामले को अन्य अदालत से स्थानांतरित किया जाता है तो उसके भी तीन महीने के भीतर निस्तारण का प्रावधान किया गया है। साथ ही प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में इन मामलों की पैरवी के लिए विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति की जाएगी। कानून यह भी सुनिश्चित करता है कि यदि किसी आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता या अन्य कानूनों के तहत जुड़े हुए आरोप भी हों, तो उन सभी आरोपों की सुनवाई एक ही विशेष अदालत में एक साथ की जा सके, जिससे समानांतर मुकदमों से बचा जा सके और न्यायिक प्रक्रिया अधिक प्रभावी बन सके।

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