रायपुर में साइबर अपराध से जुड़े एक बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जिसमें 49 म्यूल बैंक खातों के जरिए देशभर की ऑनलाइन ठगी और अवैध सट्टेबाजी से जुड़े पैसों को खपाने का आरोप सामने आया है। अधिकारियों के अनुसार, विभिन्न राज्यों में हुई साइबर ठगी से जुड़े करीब ₹36.48 लाख की राशि इन खातों में ट्रांसफर की गई थी, जिसे बाद में निकाल लिया गया।
मामला तब सामने आया जब गृह मंत्रालय द्वारा संचालित राष्ट्रीय साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन पोर्टल पर देश के अलग-अलग हिस्सों से शिकायतें दर्ज की गईं। इन शिकायतों में बताया गया कि पीड़ितों से ऑनलाइन धोखाधड़ी कर रकम वसूली गई और उसे रायपुर स्थित बैंक खातों में भेजा गया, जिनमें अधिकतर खाते बैंक ऑफ बड़ौदा के बताए जा रहे हैं।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, ये सभी 49 खाते अलग-अलग नामों पर खोले गए थे, लेकिन इन्हें “म्यूल अकाउंट” की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था। म्यूल अकाउंट वे बैंक खाते होते हैं जिनका उपयोग साइबर अपराधी अवैध धन को प्राप्त करने और आगे ट्रांसफर करने के लिए करते हैं। यह नेटवर्क जनवरी 2024 से जून 2025 के बीच सक्रिय रहा।
जांच में सामने आया है कि जैसे ही ठगी की रकम इन खातों में जमा होती थी, उसे तुरंत दूसरे खातों में ट्रांसफर कर दिया जाता था या निकाल लिया जाता था, जिससे पैसे का मूल स्रोत पकड़ना बेहद मुश्किल हो जाता था। पुलिस अब बैंकिंग रिकॉर्ड और डिजिटल ट्रांजैक्शन डेटा के आधार पर पूरे नेटवर्क की मैपिंग कर रही है।
अधिकारियों ने पुष्टि की है कि कुल ₹36,48,280 की राशि इस संदिग्ध नेटवर्क से जुड़ी पाई गई है। यह पैसा अलग-अलग साइबर फ्रॉड मामलों और ऑनलाइन क्रिकेट सट्टेबाजी से जुड़ी गतिविधियों से आया बताया जा रहा है।
साइबर क्राइम यूनिट की शिकायत के बाद सिविल लाइंस पुलिस ने खातेधारकों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। हालांकि, अब तक कई खाताधारकों की पहचान पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई है, जिससे KYC और पहचान सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
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जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि क्या एक ही बैंक शाखा से इतने बड़े पैमाने पर म्यूल अकाउंट खोलने में बैंक कर्मचारियों की कोई भूमिका थी। KYC प्रक्रिया में लापरवाही और नियमों के पालन में चूक की आशंका भी जताई जा रही है।
अधिकारियों ने यह भी बताया कि एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी ने जांच की रफ्तार को प्रभावित किया है। साइबर यूनिट ने नवंबर 2025 में कार्रवाई के लिए पत्र भेजा था, लेकिन एफआईआर कई महीनों बाद दर्ज की गई, जिससे महत्वपूर्ण सबूतों के कमजोर होने की आशंका बढ़ गई है।
साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि म्यूल अकाउंट नेटवर्क आज के समय में संगठित साइबर अपराध गिरोहों का अहम हथियार बन चुका है, जिसका इस्तेमाल फिशिंग, निवेश धोखाधड़ी, फर्जी कस्टमर केयर फ्रॉड और ऑनलाइन सट्टेबाजी से कमाए गए पैसे को छिपाने के लिए किया जाता है।
फिलहाल पुलिस इस पूरे नेटवर्क के मास्टरमाइंड की पहचान करने और पैसों के आगे के प्रवाह को ट्रैक करने में जुटी है। कॉल डिटेल रिकॉर्ड और डिजिटल ट्रांजैक्शन का विश्लेषण भी किया जा रहा है ताकि इस नेटवर्क से जुड़े सभी लोगों तक पहुंचा जा सके।
अधिकारियों ने संकेत दिया है कि यह नेटवर्क सिर्फ रायपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके अन्य राज्यों में भी लिंक हो सकते हैं। जांच अब अंतरराज्यीय साइबर फ्रॉड सिंडिकेट की दिशा में आगे बढ़ रही है।
इस मामले ने बैंकिंग सुरक्षा प्रणाली और डिजिटल ट्रांजैक्शन निगरानी पर गंभीर बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि रीयल-टाइम अलर्ट और सख्त मॉनिटरिंग से ऐसे बड़े पैमाने पर हो रहे फ्रॉड को रोका जा सकता है।
फिलहाल जांच जारी है और फॉरेंसिक फाइनेंशियल ऑडिट के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
