चंडीगढ़। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने क्लाउड-स्टोरेज निवेश योजना से जुड़े कथित धनशोधन मामले में आरोपी सुखविंदर सिंह खड़ौर की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि आर्थिक अपराध केवल निजी स्तर पर होने वाले वित्तीय उल्लंघन नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक धन, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और व्यापक जनहित को प्रभावित कर सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में जमानत पर विचार करते समय वित्तीय लेनदेन, कंपनियों के रिकॉर्ड और धन के प्रवाह से जुड़े साक्ष्यों को विशेष सावधानी से देखना जरूरी है।
जस्टिस सुमीत गोयल ने 18 सितंबर को दिए आदेश में कहा कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक संपत्ति का उपयोग जनकल्याण और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के अनुरूप होना चाहिए। अदालत के अनुसार, आर्थिक अपराध इस व्यवस्था को प्रभावित करते हैं और सार्वजनिक विश्वास तथा राष्ट्रीय हित को नुकसान पहुंचा सकते हैं। पीठ ने कहा कि ऐसे अपराधों में अक्सर योजनाबद्ध तरीके से वित्तीय और कारोबारी व्यवस्थाओं की कमजोरियों का इस्तेमाल कर धन का कथित दुरुपयोग किया जाता है।
अदालत ने कहा कि आर्थिक अपराधों में लेनदेन की जटिल संरचना, रिकॉर्ड में हेरफेर, धन का स्थानांतरण या परत-दर-परत घुमाया जाना, फर्जी दस्तावेज, कंपनियों की संरचना का कथित दुरुपयोग और अपराध से प्राप्त धन को छिपाने जैसी गतिविधियां शामिल हो सकती हैं। ऐसे मामलों में आरोपी को कथित अपराध से जोड़ने वाली विशिष्ट सामग्री जमानत के स्तर पर महत्वपूर्ण हो जाती है।
यह मामला ‘मायक्लाउडपार्टिकल’ नामक परियोजना से संबंधित है। प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार, सुखविंदर सिंह खड़ौर इस परियोजना के संस्थापक थे और वूनाउ समूह से जुड़ी कई कंपनियों पर उनका नियंत्रण था। एजेंसी का आरोप है कि निवेशकों को क्लाउड-स्टोरेज और किराये से मिलने वाले रिटर्न का दावा करते हुए ‘क्लाउड पार्टिकल्स’ खरीदने के लिए प्रेरित किया गया।
Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise
जांच एजेंसी ने आरोप लगाया कि निवेशकों को बेची गई स्टोरेज क्षमता और वास्तविक परिचालन क्षमता के बीच अंतर था। एजेंसी के मुताबिक, बाद में निवेश करने वाले लोगों से प्राप्त धन का इस्तेमाल पहले निवेश करने वालों को भुगतान करने में किया गया। इसके अलावा, समूह की कंपनियों के बीच कथित तौर पर फर्जी चालानों के जरिए धन स्थानांतरित किया गया और ग्राहकों तथा निवेशकों से जुटाए गए धन का इस्तेमाल महंगी गाड़ियों, आभूषणों, शेयरों और संपत्तियों में किए जाने का आरोप है।
अदालत के आदेश में दर्ज प्रवर्तन निदेशालय के आरोपों के अनुसार, खड़ौर को 5 अप्रैल 2019 से 6 अक्टूबर 2024 के बीच वूनाउ मार्केटिंग सर्विसेज लिमिटेड से करीब ₹14.91 करोड़ और 22 जून 2020 से 1 अक्टूबर 2024 के बीच वूनाउ इन्फोटेक प्राइवेट लिमिटेड से करीब ₹6.20 करोड़ प्राप्त हुए।
खड़ौर 28 फरवरी 2025 से हिरासत में हैं। उनकी ओर से दलील दी गई कि वह 19 महीने से अधिक समय से जेल में हैं और अभियोजन का मामला मुख्य रूप से दस्तावेजों पर आधारित है। बचाव पक्ष ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत शीघ्र सुनवाई के अधिकार का भी हवाला दिया। मामले में 24 अप्रैल 2025 को अभियोजन शिकायत दाखिल की गई थी, जिसमें 52 गवाहों और 7,000 से अधिक पृष्ठों के दस्तावेजों का उल्लेख है।
हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा कि केवल लंबे समय तक हिरासत में रहना इस मामले में जमानत देने का पर्याप्त आधार नहीं है। अदालत ने ध्यान दिया कि महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही अभी बाकी है और मुकदमा उस चरण तक नहीं पहुंचा है जहां केवल हिरासत की अवधि के आधार पर आरोपी को रिहा किया जा सके।
सह-आरोपी डिंपल खड़ौर को मिली जमानत का हवाला भी दिया गया, लेकिन अदालत ने कहा कि केवल समानता के आधार पर हर आरोपी को स्वतः जमानत नहीं दी जा सकती। प्रत्येक आरोपी की भूमिका और उसके खिलाफ उपलब्ध सामग्री अलग-अलग देखी जानी चाहिए। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि खड़ौर धनशोधन निवारण अधिनियम की धारा 45 में निर्धारित दोहरी शर्तों को पूरा नहीं करते हैं। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत याचिका पर की गई टिप्पणियां केवल मौजूदा कार्यवाही तक सीमित हैं और मुकदमे के अंतिम गुण-दोष को प्रभावित नहीं करेंगी।
