सेवानिवृत्त प्रिंसिपल से ठगी कर क्रिप्टो में बदली गई रकम; कोर्ट ने कहा—भूमिका सीमित, ट्रायल में लगेगा समय

₹3 करोड़ डिजिटल अरेस्ट केस में बड़ा फैसला: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने आरोपी को दी जमानत

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By Roopa
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Punjab & Haryana High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में डिजिटल अरेस्ट से जुड़े ₹3.03 करोड़ की साइबर ठगी मामले में आरोपी विक्रम सिंह को जमानत दे दी है। यह मामला एक सेवानिवृत्त प्रिंसिपल को डराकर लगातार डिजिटल निगरानी में रखकर अलग-अलग बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर कराने से जुड़ा है।

कोर्ट ने कहा कि आरोपी की भूमिका सीमित प्रतीत होती है और वह केवल एक छोटे हिस्से की राशि से जुड़ा पाया गया है, जिसे उसने आगे क्रिप्टोकरेंसी (USDT) में बदलकर अन्य माध्यमों में ट्रांसफर किया था।

मामले के अनुसार, पीड़िता को एक फोन कॉल के जरिए बताया गया कि उसके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं और उसे गिरफ्तार किया जा सकता है। इसके बाद उसे लगातार वर्चुअल निगरानी में रखकर डराया गया और विभिन्न बैंक खातों में कुल ₹3,03,00,000 रुपये ट्रांसफर करा लिए गए।

जांच में सामने आया कि इस पूरे नेटवर्क में कई बैंक खातों का इस्तेमाल किया गया और रकम को अलग-अलग लेयर में घुमाकर छिपाने की कोशिश की गई। आरोपी पर आरोप था कि उसने को-आरोपियों से प्राप्त ₹4,26,000 रुपये को क्रिप्टोकरेंसी में बदलने में मदद की।

याचिकाकर्ता ने अदालत में दलील दी कि उसे गलत तरीके से फंसाया गया है और वह फरवरी 2025 से हिरासत में है। यह भी कहा गया कि उसने किसी भी प्रकार से पीड़िता को डराने या ठगी के लिए प्रेरित नहीं किया।

राज्य पक्ष ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए जमानत का विरोध किया, लेकिन कोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि आरोपी का रोल सीमित है और वह आगे की जांच के लिए आवश्यक नहीं है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी की हिरासत अवधि लंबी हो चुकी है और मुकदमे के जल्द समाप्त होने की संभावना नहीं है। ऐसे में उसे हिरासत में रखना उचित नहीं होगा।

न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए जमानत याचिका स्वीकार की जाती है।

कोर्ट ने आदेश दिया कि आरोपी को नियमित जमानत पर रिहा किया जाए, बशर्ते वह व्यक्तिगत और जमानती बांड प्रस्तुत करे और शर्तों का पालन करे। इनमें देश छोड़ने पर रोक, साक्ष्य से छेड़छाड़ न करने और अदालत में नियमित पेशी शामिल हैं।

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यह मामला डिजिटल अरेस्ट स्कैम के बढ़ते मामलों के बीच एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जहां साइबर अपराधी लोगों को डरा-धमकाकर बड़ी रकम ट्रांसफर कराने में सफल हो रहे हैं।

अधिकारियों के अनुसार, ऐसे मामलों में म्यूल बैंक खातों का नेटवर्क सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है, जिनके जरिए अवैध धन को अलग-अलग लेयर में घुमाकर उसकी पहचान छिपाई जाती है और बाद में उसे डिजिटल वॉलेट या क्रिप्टोकरेंसी में बदल दिया जाता है।

कोर्ट ने यह भी माना कि ऐसे मामलों में हर आरोपी की भूमिका अलग होती है, इसलिए व्यक्तिगत भूमिका के आधार पर ही न्यायिक निर्णय लिया जाना चाहिए। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी को राहत प्रदान की।

यह फैसला साइबर अपराध मामलों में न्यायिक संतुलन को दर्शाता है, जहां एक ओर अपराध की गंभीरता देखी जाती है, वहीं दूसरी ओर हिरासत की अवधि और भूमिका का मूल्यांकन किया जाता है।

अधिकारियों के अनुसार जांच में डिजिटल ट्रांजेक्शन, बैंक रिकॉर्ड और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ी जा रही हैं ताकि मुख्य सरगना तक पहुंचा जा सके।

इस घटना ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि डिजिटल युग में सतर्कता और जागरूकता ही साइबर ठगी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।

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