रिक्शा चालक से बेटे की डिग्री दिलाने के नाम पर ₹3 लाख लेने का आरोप; फर्जी अंकतालिका, डिग्री प्रमाणपत्र और दस्तावेज तैयार करने के मामले में विश्वविद्यालय ने गठित की जांच समिति

₹3 लाख में फर्जी बीकॉम डिग्री का सौदा! पुणे विश्वविद्यालय में डिग्री घोटाले की जांच शुरू, कर्मचारी पर गंभीर आरोप

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By Roopa
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पुणे: महाराष्ट्र के सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय (एसपीपीयू) में फर्जी डिग्री जारी करने के कथित मामले ने उच्च शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विश्वविद्यालय के वित्त एवं लेखा विभाग के एक कर्मचारी पर आरोप है कि उसने एक रिक्शा चालक से उसके बेटे के लिए बिना नियमित शैक्षणिक प्रक्रिया पूरी किए बीकॉम की डिग्री दिलाने के नाम पर ₹3 लाख लिए। शिकायत सामने आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले की जांच के लिए तथ्य खोज समिति गठित कर दी है और दोषियों के खिलाफ प्रशासनिक व कानूनी कार्रवाई का भरोसा दिया है।

शिकायतकर्ता महेश कदम ने आरोप लगाया कि वह अपने बेटे की पढ़ाई से संबंधित जानकारी लेने विश्वविद्यालय पहुंचे थे, जहां उनकी मुलाकात वित्त एवं लेखा विभाग में कार्यरत रमेश मुखेकर से हुई। आरोप है कि मुखेकर और उसके कुछ सहयोगियों ने दावा किया कि वे बिना निर्धारित शैक्षणिक प्रक्रिया पूरी किए बीकॉम की डिग्री उपलब्ध करा सकते हैं। इसके बदले कथित तौर पर ₹3 लाख की मांग की गई, जिसे शिकायतकर्ता ने भुगतान कर दिया।

महेश कदम के अनुसार, भुगतान के बाद उन्हें जो दस्तावेज सौंपे गए, उन्हें देखकर उन्हें संदेह हुआ कि पूरा मामला फर्जी है। कथित डिग्री प्रमाणपत्र पर वर्तमान नाम सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के बजाय पुराने नाम यूनिवर्सिटी ऑफ पुणे का उल्लेख था। इसके अलावा एक ही डिग्री के स्थान पर प्रत्येक शैक्षणिक वर्ष के लिए अलग-अलग प्रमाणपत्र जारी किए गए थे, जबकि सामान्य प्रक्रिया के तहत पाठ्यक्रम पूरा होने पर एक ही डिग्री प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। इन विसंगतियों के बाद उन्होंने कुलपति कार्यालय में लिखित शिकायत दर्ज कराई।

विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड के अनुसार, जुलाई 2025 तक रमेश मुखेकर वित्त एवं लेखा विभाग में सहायक अनुभाग अधिकारी के पद पर कार्यरत थे। शिकायत मिलने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रारंभिक जांच शुरू की। विश्वविद्यालय की परीक्षा एवं मूल्यांकन मंडल ने अपने आधिकारिक बयान में स्वीकार किया कि उसे विश्वविद्यालय के नाम पर फर्जी अंकतालिका, डिग्री प्रमाणपत्र और अन्य दस्तावेज तैयार कर एक छात्र के साथ वित्तीय धोखाधड़ी किए जाने की शिकायत प्राप्त हुई है।

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मामले की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति ने एक तथ्य खोज समिति (फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी) का गठन किया है। समिति पूरे प्रकरण की जांच कर यह पता लगाएगी कि कथित फर्जी दस्तावेज कैसे तैयार किए गए, क्या इसमें किसी आंतरिक कर्मचारी की भूमिका थी और क्या इस तरह की घटनाएं पहले भी हुई हैं। समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

जांच में यह भी पड़ताल की जाएगी कि कथित फर्जी डिग्री और अंकतालिकाएं विश्वविद्यालय की आधिकारिक प्रणाली का दुरुपयोग कर तैयार की गईं या बाहरी स्तर पर नकली दस्तावेज बनाकर विश्वविद्यालय का नाम इस्तेमाल किया गया। यदि विश्वविद्यालय के भीतर से किसी प्रकार की मिलीभगत सामने आती है, तो जांच का दायरा और बढ़ सकता है।

प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि शैक्षणिक संस्थानों के नाम पर फर्जी डिग्री और प्रमाणपत्र तैयार करना केवल वित्तीय धोखाधड़ी नहीं, बल्कि शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी गंभीर हमला है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को डिजिटल दस्तावेज सत्यापन प्रणाली, सुरक्षित डेटाबेस, क्यूआर कोड आधारित प्रमाणपत्र और नियमित ऑडिट जैसी व्यवस्थाओं को और मजबूत करना चाहिए, ताकि ऐसे फर्जीवाड़े को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सके।

विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि जांच निष्पक्ष और व्यापक होगी तथा सभी दस्तावेजों, रिकॉर्ड और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की विस्तार से जांच की जाएगी। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित लोगों के खिलाफ कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई के साथ-साथ आपराधिक मुकदमा भी दर्ज कराया जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि इस मामले की जांच से यह भी स्पष्ट होगा कि यह एक अलग-थलग घटना थी या फिर किसी बड़े फर्जी डिग्री नेटवर्क का हिस्सा।

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