कानपुर के जाजमऊ की एक निजी फर्म ने अपने अकाउंटेंट पर fake transport bills के जरिए ₹2 करोड़ से अधिक की कथित हेराफेरी का आरोप लगाया है।

एक कॉल और खाते से गायब ₹7 लाख: कार रेंटल स्कैम में टेक कंसल्टेंट बना शिकार

Team The420
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पुणे: महाराष्ट्र के Pune में साइबर ठगी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां कार किराये पर बुक करने के नाम पर एक 25 वर्षीय टेक कंसल्टेंट से ₹7 लाख की धोखाधड़ी कर ली गई। यह घटना एक बार फिर यह साबित करती है कि कैसे ऑनलाइन सर्च और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म साइबर अपराधियों के लिए आसान हथियार बनते जा रहे हैं।

मामले के अनुसार, पीड़ित युवक Kothrud का निवासी है और एक निजी कंपनी में कार्यरत है। शिकायत के आधार पर पुलिस ने बताया कि यह घटना तब हुई जब युवक के पिता ने इंटरनेट पर कार रेंटल सर्विस की तलाश की। सर्च के दौरान उन्हें एक व्हाट्सऐप नंबर मिला, जिसे एक वैध कार रेंटल कंपनी का संपर्क बताया गया था।

हालांकि, जांच में सामने आया कि यह नंबर असल में साइबर ठगों द्वारा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर डाला गया था, ताकि लोगों को फर्जी सेवाओं के जरिए फंसाया जा सके। जब पीड़ित के पिता ने इस नंबर पर संपर्क किया, तो दूसरी ओर मौजूद व्यक्ति ने खुद को रेंटल एजेंसी का प्रतिनिधि बताते हुए पूरी बुकिंग प्रक्रिया शुरू कर दी।

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ठग ने बेहद पेशेवर तरीके से बातचीत कर भरोसा जीत लिया और कार बुकिंग के लिए अग्रिम भुगतान की बात कही। इसके बाद उसने क्रेडिट कार्ड की जानकारी साझा करने को कहा। जैसे ही कार्ड डिटेल्स साझा की गईं, कुछ ही मिनटों में कई ट्रांजैक्शन के जरिए कुल ₹7 लाख खाते से निकाल लिए गए।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, पीड़ित को इस ठगी का पता तब चला जब लगातार पैसे कटने के मैसेज आने लगे। इसके बाद तुरंत Kothrud Police Station में शिकायत दर्ज कराई गई और मामला साइबर फ्रॉड के तहत दर्ज किया गया।

जांच में यह भी सामने आया है कि साइबर अपराधियों ने सुनियोजित तरीके से यह जाल बिछाया था। वे गूगल सर्च रिजल्ट्स या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फर्जी नंबर डालते हैं और फिर खुद को वैध सेवा प्रदाता बताकर लोगों को फंसाते हैं। इस तरह के मामलों में व्हाट्सऐप कॉल, नकली वेबसाइट और फर्जी पहचान का व्यापक इस्तेमाल किया जाता है।

प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी Prof. Triveni Singh के अनुसार, “यह पूरी तरह सोशल इंजीनियरिंग का मामला है। अपराधी पहले भरोसा बनाते हैं और फिर धीरे-धीरे पीड़ित से संवेदनशील जानकारी हासिल कर लेते हैं। आजकल गूगल सर्च और व्हाट्सऐप के जरिए फर्जी पहचान बनाना साइबर ठगों की सबसे बड़ी रणनीति बन चुकी है।”

उन्होंने आगे चेतावनी देते हुए कहा, “लोगों को किसी भी ऑनलाइन नंबर पर भरोसा करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करनी चाहिए। आधिकारिक वेबसाइट या वेरिफाइड स्रोत से ही संपर्क करना सुरक्षित रहता है।”

पुलिस के अनुसार, इस मामले में डिजिटल ट्रेल, बैंक ट्रांजैक्शन और व्हाट्सऐप चैट्स की गहन जांच की जा रही है। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि ठगी की रकम किन खातों में ट्रांसफर की गई और क्या इसके पीछे कोई संगठित गिरोह सक्रिय है।

इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध जानकारी कितनी विश्वसनीय है। पुलिस ने आम लोगों को सलाह दी है कि इंटरनेट सर्च के जरिए मिले नंबरों पर आंख बंद कर भरोसा न करें और किसी भी स्थिति में अपनी बैंकिंग या कार्ड डिटेल्स साझा न करें।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी भी तरह की संदिग्ध गतिविधि दिखे, तो तुरंत बैंक और साइबर हेल्पलाइन को सूचित करना चाहिए, ताकि नुकसान को सीमित किया जा सके।

फिलहाल पुलिस मामले की जांच में जुटी हुई है और उम्मीद जताई जा रही है कि तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर जल्द ही आरोपियों तक पहुंच बनाई जा सकेगी। यह मामला न केवल एक व्यक्ति के साथ हुई ठगी का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि साइबर अपराधी किस तरह लोगों की छोटी-सी चूक का फायदा उठाकर बड़े आर्थिक नुकसान पहुंचा रहे हैं।

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