नई दिल्ली: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी और साइबर धोखाधड़ी से जुड़े एक बड़े नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करते हुए सोमवार को पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ में छापेमारी की। यह कार्रवाई ऐसे संगठित गिरोह की जांच के तहत की गई, जो भारतीय युवाओं को विदेश में आकर्षक नौकरी का लालच देकर अवैध रूप से म्यांमार पहुंचाता था, जहां उन्हें साइबर ठगी करने वाली कंपनियों में जबरन काम करने के लिए मजबूर किया जाता था।
एनआईए के अनुसार, तलाशी अभियान पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर और छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में चलाया गया। एजेंसी को उम्मीद है कि इन छापों से मानव तस्करी, साइबर अपराध और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े अहम डिजिटल व दस्तावेजी साक्ष्य मिलेंगे, जिनके आधार पर जांच को आगे बढ़ाया जाएगा।
यह कार्रवाई उस चार्जशीट के लगभग पांच महीने बाद हुई है, जिसे एनआईए ने फरवरी 2026 में हरियाणा के पंचकूला स्थित विशेष अदालत में दाखिल किया था। चार्जशीट में तीन आरोपियों—अंकित कुमार उर्फ अंकित भारद्वाज, इश्तिखार अली उर्फ अली और फरार संदिग्ध चीनी नागरिक लीसा—को नामजद किया गया है। इनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं तथा प्रवासन अधिनियम की धारा 24 के तहत आरोप लगाए गए हैं।
जांच में सामने आया कि यह गिरोह भारतीय और विदेशी एजेंटों के साथ मिलकर आर्थिक रूप से कमजोर तथा नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं को निशाना बनाता था। उन्हें थाईलैंड में वैध रोजगार दिलाने का भरोसा दिया जाता था और ऑनलाइन इंटरव्यू भी कराए जाते थे ताकि पूरा भर्ती प्रक्रिया वास्तविक प्रतीत हो।
एनआईए के मुताबिक, गिरफ्तार आरोपी अंकित कुमार और इश्तिखार अली कथित तौर पर भर्ती प्रक्रिया का संचालन करते थे। वे पीड़ितों को लीसा नामक महिला से ऑनलाइन मिलवाते थे, जिसे एक अधिकृत विदेशी भर्ती एजेंट के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। जांच एजेंसी का कहना है कि लीसा के म्यांमार में मौजूद एक चीनी नेटवर्क से जुड़े होने की आशंका है और वह फिलहाल फरार है।
Registration Begins for FutureCrime Summit 2026, India’s Largest Cybercrime Conference
पीड़ितों को पहले भारत से थाईलैंड भेजा जाता था। वहां से उन्हें कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना सीमा पार कर म्यांमार के म्यावाडी क्षेत्र में पहुंचाया जाता था। यह इलाका लंबे समय से साइबर स्कैम संचालन करने वाले संगठित गिरोहों का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
म्यांमार पहुंचने के बाद पीड़ितों से उनकी इच्छा के विरुद्ध साइबर धोखाधड़ी कराई जाती थी। उन्हें फर्जी सोशल मीडिया प्रोफाइल बनाकर अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों के लोगों से संपर्क करने के लिए मजबूर किया जाता था। इसके बाद निवेश के नाम पर उन्हें फर्जी क्रिप्टोकरेंसी और अन्य ऑनलाइन निवेश योजनाओं में धन लगाने के लिए बहकाया जाता था।
एनआईए ने बताया कि जो लोग इस अवैध गतिविधि में शामिल होने से इनकार करते थे, उन्हें बंधक बनाकर रखा जाता था। उन पर मानसिक और शारीरिक दबाव बनाया जाता था तथा रिहाई के बदले भारी रकम वसूली जाती थी। कई पीड़ितों को लगातार निगरानी में रखा जाता था ताकि वे वहां से भाग न सकें।
जांच एजेंसी का कहना है कि इस मामले में मानव तस्करी, अवैध विदेशी भर्ती, सीमा पार अपराध और साइबर वित्तीय धोखाधड़ी का संगठित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क सक्रिय था। इस नेटवर्क में भारत के अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में फैले एजेंट और बिचौलिए शामिल होने की आशंका है।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि हाल के वर्षों में दक्षिण-पूर्व एशिया में संचालित साइबर स्कैम सेंटर मानव तस्करी का नया चेहरा बनकर उभरे हैं। उन्होंने कहा कि विदेशी नौकरी के आकर्षक प्रस्तावों की स्वतंत्र रूप से जांच किए बिना स्वीकार नहीं करना चाहिए और केवल अधिकृत भर्ती एजेंसियों के माध्यम से ही विदेश में रोजगार के लिए आवेदन करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में समय पर शिकायत और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय ही इस तरह के संगठित अपराध पर प्रभावी अंकुश लगा सकता है।
