नई दिल्ली: इंसॉल्वेंसी कानून और बाजार नियमन के बीच लंबे समय से चल रहे टकराव पर बड़ा फैसला देते हुए National Company Law Appellate Tribunal (NCLAT) ने स्पष्ट कर दिया है कि दिवालिया प्रक्रिया के दौरान नियामकीय पाबंदियां बाधा नहीं बन सकतीं। ट्रिब्यूनल ने Bombay Stock Exchange (BSE) की अपीलों को खारिज करते हुए National Company Law Tribunal (NCLT) के उस अधिकार को बरकरार रखा, जिसके तहत वह कंपनियों के डिमैट खातों को डीफ्रीज करने का आदेश दे सकता है।
ट्रिब्यूनल के इस फैसले ने Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) की सर्वोच्चता को एक बार फिर स्थापित कर दिया है। NCLAT ने अपने आदेश में कहा कि IBC की धारा 60(5) के तहत NCLT को व्यापक अधिकार प्राप्त हैं और वह इंसॉल्वेंसी समाधान से जुड़े किसी भी मुद्दे पर सुनवाई कर सकता है, भले ही मामला सिक्योरिटीज कानूनों के दायरे में आता हो।
यह मामला दो कंपनियों—Future Corporate Resources और Liz Traders and Agents—से जुड़ा है, जिनके डिमैट खाते BSE ने नियामकीय अनुपालन में कमी के चलते फ्रीज कर दिए थे। इनमें लिस्टिंग फीस और जुर्माने का भुगतान न करना शामिल था। इस कार्रवाई के कारण कंपनियां अपने शेयरों तक पहुंच नहीं बना पा रही थीं, जिससे एसेट मोनेटाइजेशन और लेनदारों की वसूली की प्रक्रिया प्रभावित हो रही थी।
इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया के दौरान कंपनियों के रेजोल्यूशन प्रोफेशनल्स और लिक्विडेटर्स ने NCLT का रुख किया। उनका तर्क था कि डिमैट खातों को डीफ्रीज किए बिना शेयरों की बिक्री संभव नहीं होगी, जिससे एसेट वैल्यू को अधिकतम करना और लेनदारों को भुगतान सुनिश्चित करना मुश्किल हो जाएगा। इस दलील को स्वीकार करते हुए NCLT ने 2024 और 2025 में आदेश जारी कर BSE को खातों से फ्रीज हटाने का निर्देश दिया।
इन आदेशों को चुनौती देते हुए BSE ने NCLAT में अपील दायर की। एक्सचेंज का कहना था कि डिमैट खातों से जुड़े मामलों का नियमन Securities and Exchange Board of India (SEBI) के तहत होता है और ऐसे मामलों में NCLT का हस्तक्षेप उचित नहीं है।
हालांकि, NCLAT ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि एक बार जब कोई कंपनी इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया में प्रवेश कर जाती है, तो IBC का ढांचा सर्वोपरि हो जाता है। “इंसॉल्वेंसी समाधान से जुड़े या उससे उत्पन्न किसी भी मुद्दे पर NCLT का अधिकार क्षेत्र बनता है,” ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा।
अपने विस्तृत आदेश में NCLAT ने यह भी स्पष्ट किया कि डिमैट खातों को डीफ्रीज करने का उद्देश्य सीधे तौर पर इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया से जुड़ा है। इन खातों में मौजूद शेयरों की बिक्री से लेनदारों की वसूली संभव हो सकती है, जो IBC का मूल उद्देश्य है।
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ट्रिब्यूनल ने IBC की धारा 238 का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी अन्य कानून के साथ टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है, तो IBC के प्रावधान प्रभावी होंगे। यानी, सिक्योरिटीज कानून और IBC के बीच किसी भी प्रकार के विरोधाभास में IBC को प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि समाधान प्रक्रिया में कोई बाधा न आए।
“अधिनिर्णायक प्राधिकरण ने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहते हुए आदेश पारित किए हैं,” NCLAT ने कहा और यह भी जोड़ा कि NCLT के आदेशों में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई है। ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि डिमैट खातों में मौजूद शेयरों के स्वामित्व को लेकर कोई विवाद नहीं है, जिससे उन्हें इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया में उपयोग करने का रास्ता और मजबूत होता है।
यह फैसला उन मामलों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, जहां लिस्टेड कंपनियों की इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया के दौरान नियामकीय प्रतिबंध एसेट रिकवरी में बाधा बनते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय इंसॉल्वेंसी कानून और सिक्योरिटीज रेगुलेशन के बीच संतुलन को स्पष्ट करता है।
इस फैसले से यह सुनिश्चित हुआ है कि तकनीकी या प्रक्रियात्मक बाधाएं इंसॉल्वेंसी समाधान को धीमा नहीं करेंगी और लेनदारों की वसूली में देरी नहीं होगी। साथ ही, यह संकेत भी मिला है कि जरूरत पड़ने पर नियामकीय प्रतिबंधों में अस्थायी ढील दी जा सकती है, ताकि संकटग्रस्त कंपनियों को पुनर्जीवित किया जा सके।
कुल मिलाकर, NCLAT के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया को समानांतर नियामकीय बाधाओं के जरिए रोका नहीं जा सकता। आने वाले समय में यह फैसला एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जाएगा, खासकर उन मामलों में जहां वित्तीय बाजार और दिवालिया कानून आमने-सामने आते हैं।
