बायोकेमिस्ट्री पेपर में ChatGPT के इस्तेमाल का आरोप; दोबारा परीक्षा कराने का फैसला, मेडिकल शिक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल

“AI से नकल का खेल: एम्स परीक्षा में शौचालय में छिपे मोबाइल से पेपर हल, 50 से ज्यादा छात्र शक के घेरे में”

Roopa
By Roopa
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नई दिल्ली। देश के शीर्ष चिकित्सा संस्थानों में शामिल एम्स में एमबीबीएस परीक्षा के दौरान नकल का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल के जरिए प्रश्नपत्र हल करने का आरोप लगा है। शुरुआती जानकारी के अनुसार, कुछ छात्रों ने शौचालय में मोबाइल फोन छिपाकर रखा था और उसी के जरिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर परीक्षा के सवालों के जवाब हासिल किए।

यह मामला तब उजागर हुआ जब परीक्षा के दौरान असामान्य रूप से बड़ी संख्या में छात्र बार-बार शौचालय जाने की अनुमति मांगने लगे। इस पर संदेह होने के बाद जब जांच की गई, तो कथित तौर पर पूरा नेटवर्क सामने आया। बताया जा रहा है कि इस तरीके से 50 से 60 छात्रों ने बायोकेमिस्ट्री के प्रश्नपत्र को हल करने में तकनीक का सहारा लिया।

शौचालय बना ‘डिजिटल एग्जाम सेंटर’

सूत्रों के मुताबिक, परीक्षा शुरू होने से पहले ही शौचालय में एक मोबाइल फोन छिपाकर रखा गया था। परीक्षा के दौरान छात्र बारी-बारी से वहां जाते और प्रश्नपत्र के सवाल मोबाइल पर अपलोड कर डिजिटल माध्यम से उत्तर खोजते थे। इस पूरी प्रक्रिया में इंटरनेट आधारित AI टूल का उपयोग किया गया, जिससे कम समय में सटीक जवाब मिलने की संभावना रहती है।

परीक्षा केंद्र में मोबाइल फोन पूरी तरह प्रतिबंधित होते हैं और इंटरनेट की सुविधा भी नहीं होती, ऐसे में यह तरीका बेहद सुनियोजित और जोखिम भरा माना जा रहा है। यह घटना इस बात का संकेत देती है कि पारंपरिक परीक्षा सुरक्षा उपाय अब नई तकनीकों के सामने कमजोर पड़ सकते हैं।

संस्थान की सफाई और तत्काल कार्रवाई

मामले के सामने आने के बाद संस्थान प्रशासन ने त्वरित कदम उठाते हुए संबंधित परीक्षा को रद्द कर दिया और दोबारा परीक्षा कराने का निर्णय लिया। संस्थान की ओर से दी गई सफाई में कहा गया कि एक छात्र का मोबाइल शौचालय में रह गया था, जिसे अन्य छात्रों ने देखा और संभवतः उसका दुरुपयोग किया।

हालांकि, इस मामले में अभी तक किसी छात्र के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन पूरे घटनाक्रम ने संस्थान के भीतर गंभीर चिंतन को जन्म दिया है कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को कैसे रोका जाए।

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सबसे प्रतिष्ठित संस्थान में नकल का मामला

एम्स जैसे संस्थान में एमबीबीएस की सीमित सीटों पर प्रवेश पाने के लिए देशभर के प्रतिभाशाली छात्र प्रतिस्पर्धा करते हैं। ऐसे में परीक्षा में नकल का मामला सामने आना न केवल संस्थान की प्रतिष्ठा पर असर डालता है, बल्कि मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और नैतिकता पर भी सवाल खड़े करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब उच्च स्तर की परीक्षाओं में इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं, तो यह शिक्षा प्रणाली में तकनीकी दुरुपयोग की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाता है।

तकनीक का दुरुपयोग बनता नया खतरा

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, AI आधारित प्लेटफॉर्म्स का उपयोग जहां सीखने और शोध के लिए फायदेमंद है, वहीं इसका गलत इस्तेमाल गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। खासकर परीक्षाओं में इसका दुरुपयोग रोकना संस्थानों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

इस मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल पारंपरिक निगरानी पर्याप्त नहीं है। अब परीक्षा केंद्रों में डिजिटल निगरानी, जैमर सिस्टम और सख्त प्रोटोकॉल लागू करने की जरूरत महसूस की जा रही है।

भविष्य के लिए सख्त उपाय जरूरी

घटना के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या वर्तमान परीक्षा प्रणाली तकनीकी रूप से पर्याप्त सुरक्षित है। विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि संस्थानों को AI डिटेक्शन टूल्स, बेहतर निगरानी व्यवस्था और कड़े अनुशासनात्मक नियम लागू करने होंगे।

साथ ही, छात्रों के बीच नैतिक शिक्षा और परीक्षा की शुचिता को लेकर जागरूकता बढ़ाना भी जरूरी है। क्योंकि तकनीक जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से उसके दुरुपयोग के तरीके भी विकसित हो रहे हैं।

यह घटना एक चेतावनी है कि अगर समय रहते शिक्षा प्रणाली ने खुद को तकनीकी रूप से मजबूत नहीं किया, तो भविष्य में इस तरह के मामले और बढ़ सकते हैं—जो न केवल संस्थानों की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाएंगे, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की नींव को भी कमजोर कर सकते हैं।

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