नई दिल्ली। भारत में तेजी से फैल रहे डिजिटल बैंकिंग इकोसिस्टम के बीच एक नया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल ‘मिथोस’ चिंता का कारण बनकर उभरा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने इस संभावित तकनीकी जोखिम को गंभीरता से लेते हुए देश के बैंकों, सरकारी एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के साथ उच्च स्तरीय चर्चा शुरू कर दी है। शुरुआती आकलनों में संकेत मिले हैं कि यदि इस तरह के उन्नत AI मॉडल का दुरुपयोग हुआ, तो यह बैंकिंग सॉफ्टवेयर की कमजोरियों को बेहद तेज़ी से उजागर कर सकता है, जिससे साइबर हमलों का खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
डिजिटल ट्रांजैक्शन, ऑनलाइन लोन और मोबाइल बैंकिंग के बढ़ते इस्तेमाल ने जहां आम लोगों की जिंदगी आसान बनाई है, वहीं इसके साथ जुड़े जोखिम भी जटिल होते जा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ‘मिथोस’ जैसे AI सिस्टम सेकंडों में कोड की खामियां खोजने की क्षमता रखते हैं। इसका मतलब यह है कि जो काम पहले हैकर्स को दिनों या हफ्तों में करना पड़ता था, वह अब कुछ मिनटों में संभव हो सकता है।
खतरा आखिर कितना बड़ा है?
मामले को समझें तो यह एक ऐसे ‘डिजिटल मास्टर की’ जैसा है, जो बैंकिंग सिस्टम के ताले की हर कमजोरी पहचान सकता है। यदि यह तकनीक गलत हाथों में पहुंचती है, तो बैंक सर्वर, ग्राहक डेटा और पेमेंट गेटवे जैसे संवेदनशील हिस्से सीधे निशाने पर आ सकते हैं। खासकर नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) द्वारा संचालित UPI नेटवर्क पर इसका प्रभाव गंभीर माना जा रहा है।
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सूत्रों के अनुसार, NPCI भी इस AI मॉडल पर करीबी नजर रख रहा है और इसके शुरुआती एक्सेस के जरिए संभावित खतरों को समझने की तैयारी में है। उद्देश्य साफ है—किसी भी बड़े साइबर हमले से पहले सिस्टम को मजबूत करना।
RBI क्यों हुआ सतर्क?
RBI की भूमिका सिर्फ मुद्रा प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की वित्तीय स्थिरता और बैंकिंग सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसी वजह से केंद्रीय बैंक ने बैंकों से उनके साइबर सुरक्षा ढांचे, AI के इस्तेमाल की नीति और जोखिम प्रबंधन रणनीतियों पर विस्तृत जानकारी मांगी है।
बैंकिंग सेक्टर में पहले ही फिशिंग, OTP फ्रॉड और डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराध बढ़ रहे हैं। ऐसे में एक अत्याधुनिक AI मॉडल इन खतरों को और जटिल बना सकता है।
विशेषज्ञों की चेतावनी
प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है, “आज के साइबर अपराधी केवल तकनीक नहीं, बल्कि AI-संचालित ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का इस्तेमाल कर रहे हैं। यदि मिथोस जैसे मॉडल अनियंत्रित रहे, तो बैंकिंग फ्रॉड पहले से कहीं ज्यादा सटीक और बड़े पैमाने पर हो सकते हैं।”
उनके अनुसार, भविष्य के साइबर हमले ऑटोमेटेड और अत्यधिक टार्गेटेड होंगे, जिनसे बचाव के लिए पारंपरिक सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं रहेंगे।
जोखिम के साथ अवसर भी
हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि ऐसे AI मॉडल्स को नियंत्रित और सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो बैंकिंग सेक्टर में क्रांति आ सकती है। फ्रॉड डिटेक्शन तेज़ होगा, ग्राहक सेवा बेहतर बनेगी और लोन प्रोसेसिंग जैसी सेवाएं और अधिक स्मार्ट हो जाएंगी।
लेकिन संतुलन बेहद जरूरी है। जरा सी चूक से यही तकनीक डेटा चोरी, सिस्टम फेलियर और बड़े वित्तीय नुकसान का कारण बन सकती है।
आगे की राह क्या?
RBI अब इस दिशा में एक व्यापक फ्रेमवर्क तैयार करने की योजना बना रहा है, जिसमें AI के सुरक्षित उपयोग, साइबर सुरक्षा मानकों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर जोर दिया जाएगा। साथ ही, बैंकों को एडवांस थ्रेट डिटेक्शन सिस्टम अपनाने और नियमित ऑडिट कराने के निर्देश भी दिए जा सकते हैं।
डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहां हर लेनदेन स्क्रीन पर सिमट गया है, वहीं ‘मिथोस’ जैसे AI मॉडल यह याद दिलाते हैं कि तकनीक जितनी ताकतवर होती है, उतनी ही जिम्मेदारी भी मांगती है। आने वाले समय में यह तय करेगा कि AI बैंकिंग सिस्टम का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बनेगा या सबसे बड़ा खतरा।
