मुंबई: मुंबई साइबर पुलिस ने डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी के एक बड़े मामले में 73 वर्षीय कारोबारी से ठगे गए ₹7.9 करोड़ में से ₹1.1 करोड़ की राशि बचाने में सफलता हासिल की है। अंधेरी (पश्चिम) निवासी कारोबारी को साइबर ठगों ने करीब दो सप्ताह तक कथित “डिजिटल अरेस्ट” में रखकर लगातार मानसिक दबाव बनाया और मनी लॉन्ड्रिंग जांच के नाम पर अलग-अलग बैंक खातों में करोड़ों रुपये ट्रांसफर करा लिए।
पुलिस के अनुसार, पीड़ित ने 21 जुलाई को वेस्ट साइबर पुलिस थाने में अज्ञात आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई। शिकायत में बताया गया कि 5 जुलाई से 18 जुलाई के बीच साइबर ठगों ने उसे डिजिटल अरेस्ट में रखा और जांच के नाम पर दिल्ली समेत कम से कम छह बैंक खातों में ₹7.9 करोड़ ट्रांसफर करवा लिए। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए अब तक करीब ₹1.1 करोड़ की राशि फ्रीज कर सुरक्षित कर ली है, जबकि शेष रकम का पता लगाने के प्रयास जारी हैं।
जांच में सामने आया कि ठगों ने खुद को दिल्ली पुलिस का अधिकारी बताकर कारोबारी से संपर्क किया। उन्होंने दावा किया कि पीड़ित के आधार और पैन कार्ड का इस्तेमाल कर एक बैंक खाता खोला गया है, जिसका संबंध जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले से है। ठगों ने मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बताते हुए कारोबारी को किसी से भी इसकी जानकारी साझा न करने की चेतावनी दी और लगातार मानसिक दबाव में रखा।
शिकायत के अनुसार, 5 जुलाई की सुबह करीब 11:30 बजे कारोबारी को व्हाट्सएप कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली पुलिस का अधिकारी बताते हुए पूछताछ के लिए तैयार रहने को कहा। इसके बाद व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर एक अन्य व्यक्ति ने खुद को राहुल गुप्ता नामक दिल्ली पुलिस अधिकारी बताया। उसने दावा किया कि पीड़ित के आधार कार्ड से खोले गए बैंक खाते में ₹7 करोड़ जमा हुए हैं, जो कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले से जुड़े हैं। ठगों ने व्हाट्सएप पर गिरफ्तारी वारंट भेजने की धमकी देकर कारोबारी को भयभीत कर दिया।
डर और मानसिक दबाव में आकर कारोबारी ने ठगों के निर्देशानुसार कई चरणों में अलग-अलग खातों में बड़ी रकम ट्रांसफर कर दी। पुलिस के मुताबिक, जब आरोपियों ने बैंक खाते में जमा पूरी राशि खत्म होने के बाद भी और पैसे मांगे तथा बैंक से ऋण लेकर रकम भेजने का दबाव बनाया, तब पीड़ित को अपने साथ हुई ठगी का एहसास हुआ।
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जांच में यह भी सामने आया कि साइबर गिरोह ने ठगी की रकम को छिपाने और विभिन्न खातों में स्थानांतरित करने के लिए पांच राज्यों में फैले करीब 200 म्यूल बैंक खातों का इस्तेमाल किया। पुलिस का मानना है कि रकम को तेजी से कई खातों के माध्यम से घुमाकर उसकी वास्तविक ट्रेल छिपाने का प्रयास किया गया।
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि दिल्ली पुलिस को एक म्यूल खाते में संदिग्ध लेनदेन का पता चलने के बाद मामले की जानकारी मिली थी। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने संबंधित बैंक खाते को फ्रीज कर जांच शुरू की और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के माध्यम से मुंबई साइबर पुलिस को अलर्ट भेजा। सूचना मिलने पर साइबर पुलिस और स्थानीय पुलिसकर्मी लगातार दो दिनों तक कारोबारी के घर पहुंचे और उन्हें समझाने का प्रयास किया कि वे साइबर ठगी का शिकार हो रहे हैं।
हालांकि, कारोबारी को विश्वास था कि व्हाट्सएप पर बात करने वाले ही असली पुलिस अधिकारी हैं। पुलिस के अनुसार, उन्होंने अधिकारियों से मिलने से इनकार कर दिया, उन्हें घर के अंदर नहीं आने दिया और खुद को ठगी का शिकार मानने से भी इंकार करते रहे। इससे समय रहते बड़ी राशि बचाने की संभावना प्रभावित हुई।
बाद में दिल्ली पुलिस ने फ्रीज किए गए खाते से जुड़े लेनदेन का विश्लेषण कर अन्य संभावित पीड़ितों से भी संपर्क किया। कारोबारी से संपर्क नहीं हो पाने पर मामला I4C के माध्यम से मुंबई साइबर पुलिस तक पहुंचाया गया, जिसके बाद आखिरकार पीड़ित को ठगी का एहसास हुआ और उसने शिकायत दर्ज कराई।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट पूरी तरह साइबर अपराधियों द्वारा अपनाई जाने वाली सोशल इंजीनियरिंग की तकनीक है। कोई भी पुलिस, सीबीआई, ईडी या अन्य सरकारी एजेंसी व्हाट्सएप कॉल या वीडियो कॉल पर पूछताछ नहीं करती और न ही जांच के नाम पर किसी से पैसे ट्रांसफर कराने का निर्देश देती है। उन्होंने लोगों से ऐसे किसी भी कॉल पर घबराने के बजाय उसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि करने और तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 या निकटतम साइबर पुलिस स्टेशन से संपर्क करने की अपील की।
