मेरठ। उत्तर प्रदेश के मेरठ में साइबर क्राइम के एक संगठित नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जिसमें नाइजीरियाई छात्रों की भूमिका सामने आई है। एक निजी विश्वविद्यालय में नर्सिंग की पढ़ाई कर रहा विदेशी छात्र उमर को पुलिस ने लाखों रुपये की साइबर ठगी के मामले में गिरफ्तार किया है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि यह कोई अकेला मामला नहीं, बल्कि एक संगठित गिरोह का हिस्सा है, जो देश के अलग-अलग राज्यों में लोगों को निशाना बना रहा था।
जांच के अनुसार, उमर और उसके साथियों ने मिलकर एक साइबर गैंग बनाया था, जिसमें दिल्ली और गुरुग्राम में पढ़ रहे अन्य विदेशी छात्र भी शामिल थे। यह गिरोह तकनीकी तरीकों—जैसे डीपफेक वीडियो, फर्जी सॉफ्टवेयर और ऑनलाइन सोशल इंजीनियरिंग—का इस्तेमाल कर लोगों को झांसे में लेता था। इसके जरिए बैंक खातों से बड़ी रकम ट्रांसफर कराई जाती थी।
पुलिस के मुताबिक, उमर इस नेटवर्क में ‘फर्स्ट लेयर’ ऑपरेटर के तौर पर काम कर रहा था। यानी ठगी की रकम सबसे पहले उसके बैंक खाते में आती थी, जिसके बाद उसे आगे अन्य चैनलों में ट्रांसफर किया जाता था। जांच में उसके खाते में करीब ₹25 लाख की संदिग्ध ट्रांजैक्शन की पुष्टि हुई है। यही ट्रेल उसके खिलाफ सबसे बड़ा सबूत बना।
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बताया गया कि साइबर अपराध के रिकॉर्ड और डिजिटल ट्रैकिंग के आधार पर उमर की पहचान की गई। इसके बाद उसे टीपीनगर इलाके में उसके किराए के कमरे से गिरफ्तार किया गया। उसके पास से मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए गए हैं, जिनकी फॉरेंसिक जांच की जा रही है। उसका पासपोर्ट भी कब्जे में लिया गया है।
पूछताछ के दौरान एक दिलचस्प पहलू यह भी सामने आया कि उमर केवल अंग्रेजी में ही बातचीत कर रहा है, जिससे शुरुआती पूछताछ में दिक्कत आई। फिलहाल उससे विस्तार से पूछताछ जारी है और उसके नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों के नाम-पते की पुष्टि की जा रही है।
जांच में यह भी सामने आया है कि इस गिरोह के दो सदस्य पिछले साल सितंबर में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद देश छोड़कर फरार हो चुके हैं। माना जा रहा है कि वे विदेश से ही इस नेटवर्क को ऑपरेट कर रहे हैं। ऐसे में यह मामला अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध की श्रेणी में भी आ सकता है।
कई राज्यों से जुड़े इनपुट के बाद हुई इस गिरफ्तारी के बाद संबंधित राज्यों को भी अलर्ट भेजा गया है, ताकि इस नेटवर्क से जुड़े अन्य मामलों की कड़ियां जोड़ी जा सकें। शुरुआती संकेत बताते हैं कि यह गिरोह लंबे समय से सक्रिय था और कई लोगों को अपना शिकार बना चुका है।
साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में विदेशी छात्रों या अस्थायी निवासियों का इस्तेमाल ‘म्यूल अकाउंट’ के तौर पर किया जाता है, ताकि ट्रांजैक्शन को ट्रेस करना मुश्किल हो जाए।
प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “साइबर ठग अब तकनीक और सोशल इंजीनियरिंग का मिश्रण इस्तेमाल कर रहे हैं। डीपफेक और फर्जी पहचान के जरिए भरोसा जीतकर सीधे बैंक खातों तक पहुंच बनाई जा रही है। ऐसे मामलों में आम लोगों को बेहद सतर्क रहने की जरूरत है।”
फिलहाल पुलिस इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलने में जुटी है। उमर से मिली जानकारी के आधार पर देश के अन्य हिस्सों में भी छापेमारी की संभावना जताई जा रही है। साथ ही, विदेशी एजेंसियों से समन्वय कर फरार आरोपियों को पकड़ने की तैयारी भी शुरू कर दी गई है।
