चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने चेन्नई और कोयंबटूर नगर निगमों में कथित ₹98.25 करोड़ की टेंडर अनियमितताओं से जुड़े मामले में जांच और अभियोजन प्रक्रिया में हो रही देरी पर कड़ी नाराजगी जताते हुए पूर्व लोक सचिव रीता हरीश ठक्कर को अदालत में व्यक्तिगत रूप से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि महत्वपूर्ण फाइलों को बिना किसी स्पष्ट कारण के लंबे समय तक लंबित रखना न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है और इसका संतोषजनक स्पष्टीकरण आवश्यक है।
यह आदेश न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश की एकलपीठ ने अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। यह याचिका सामाजिक संगठन अरप्पोर इयक्कम द्वारा दायर की गई है, जिसमें वर्ष 2014 से 2018 के बीच तत्कालीन एआईएडीएमके सरकार के कार्यकाल में चेन्नई और कोयंबटूर नगर निगमों में कथित ₹98.25 करोड़ की टेंडर अनियमितताओं की जांच में देरी का मुद्दा उठाया गया है।
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि मामले में दो आईएएस अधिकारियों के विरुद्ध अभियोजन की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए केंद्र सरकार को भेजे जाने वाले प्रस्ताव से संबंधित फाइल 27 फरवरी से लंबित पड़ी हुई है। अदालत ने टिप्पणी की कि फाइल को इतने लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ाया गया और इसके पीछे कोई संतोषजनक कारण भी प्रस्तुत नहीं किया गया।
न्यायमूर्ति वेंकटेश ने कहा कि चूंकि तत्कालीन लोक सचिव की ओर से इस विलंब का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है, इसलिए पूर्व लोक सचिव रीता हरीश ठक्कर को 3 अगस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के समक्ष उपस्थित होकर जवाब देना होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि सेवा से सेवानिवृत्त हो जाने मात्र से किसी अधिकारी की उस अवधि के दौरान निभाई गई प्रशासनिक जिम्मेदारियां समाप्त नहीं हो जातीं।
अदालत ने वर्तमान लोक सचिव को भी निर्देश दिया कि वह शपथपत्र दाखिल कर यह स्पष्ट करें कि संबंधित फाइल को आगे बढ़ाने में इतनी देरी क्यों हुई और इसके लिए कौन-कौन से प्रशासनिक कारण जिम्मेदार थे। न्यायालय ने संकेत दिया कि यदि सार्वजनिक प्रशासन में जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की गई तो भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच प्रभावित हो सकती है।
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सुनवाई के दौरान अतिरिक्त लोक अभियोजक अरुण अन्बुमणि ने अदालत को बताया कि राज्य में नई सरकार के गठन के बाद मामले में शीघ्र प्रगति होने की संभावना है। हालांकि न्यायालय ने इस दलील को पर्याप्त नहीं माना और कहा कि सरकार बदलने या प्रशासनिक परिवर्तन से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित नहीं होनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का शासन सर्वोपरि है और किसी भी मामले की जांच या अभियोजन में अनावश्यक देरी स्वीकार नहीं की जा सकती।
मामले की पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से ऐसा प्रतीत होता है कि अभियोजन स्वीकृति प्राप्त करने की प्रक्रिया को जानबूझकर धीमा किया गया। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि जांच से संबंधित फाइलें लंबे समय तक लंबित रखी जाती हैं तो इससे न्यायिक प्रक्रिया बाधित होती है और भ्रष्टाचार के मामलों में प्रभावी कार्रवाई प्रभावित होती है। न्यायालय ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका निष्पक्ष और समयबद्ध होनी चाहिए।
यह मामला चेन्नई और कोयंबटूर नगर निगमों में कथित टेंडर अनियमितताओं से संबंधित है, जिनकी जांच पिछले कई वर्षों से विभिन्न स्तरों पर चल रही है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि अभियोजन की प्रक्रिया में लगातार हो रही देरी के कारण मामले की प्रगति प्रभावित हुई है और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध समय पर कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
फिलहाल अदालत ने पूर्व लोक सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति और वर्तमान लोक सचिव के शपथपत्र का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को निर्धारित की है। न्यायालय ने संकेत दिया कि प्राप्त स्पष्टीकरण और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद आगे की न्यायिक कार्रवाई पर निर्णय लिया जाएगा। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार और सार्वजनिक धन से जुड़े मामलों में प्रशासनिक विलंब को गंभीरता से देखा जाएगा तथा कानून के अनुरूप समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करना सभी संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है।
