चेन्नई। तमिलनाडु में निजी स्कूल प्रबंधनों से कथित तौर पर ₹100 करोड़ से अधिक की रकम वसूलने के मामले में हिरासत में लिए गए तमिलनाडु प्राइवेट स्कूल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बी.टी. अरसाकुमार को मद्रास हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने सोमवार को चेन्नई पुलिस आयुक्त की ओर से 11 जुलाई 2026 को पारित वह निवारक हिरासत आदेश रद्द कर दिया, जिसके तहत अरसाकुमार को गुंडा एक्ट के तहत हिरासत में लिया गया था। अदालत ने यह फैसला हिरासत आदेश वापस लेने के लिए दायर अभ्यावेदन पर विचार करने में हुई देरी को आधार बनाते हुए दिया।
न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार और न्यायमूर्ति के. राजशेखर की पीठ ने अरसाकुमार की पत्नी की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार कर ली। पीठ ने माना कि जब किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता निवारक हिरासत के जरिए सीमित की जाती है, तब हिरासत रद्द करने के लिए दिए गए अभ्यावेदन पर बिना अनावश्यक देरी के विचार किया जाना जरूरी है। अरसाकुमार ने 23 जुलाई को हिरासत आदेश वापस लेने के लिए अभ्यावेदन दिया था। अदालत ने इसी पर विचार करने में हुई देरी को आदेश रद्द करने का महत्वपूर्ण आधार माना।
याचिका में यह भी दलील दी गई थी कि अरसाकुमार के खिलाफ लगाए गए आरोप सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों की श्रेणी में नहीं आते। इसलिए तमिलनाडु प्रिवेंशन ऑफ डेंजरस एक्टिविटीज ऑफ बूटलेगर्स, ड्रग ऑफेंडर्स, गुंडाज, इमोरल ट्रैफिक ऑफेंडर्स एंड स्लम-ग्रैबर्स एक्ट, 1982 के तहत निवारक हिरासत में रखने की जरूरत नहीं थी। वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन ने अदालत के समक्ष इसी आधार पर हिरासत आदेश को चुनौती दी थी।
मामले की शुरुआत 23 जून को हुई शिकायत से हुई थी। तमिलनाडु प्राइवेट स्कूल्स फेडरेशन के सचिव सी. एलंगोवन ने पुलिस आयुक्त से शिकायत की थी। इसमें अरसाकुमार पर ‘तमिलनाडु प्राइवेट स्कूल्स एसोसिएशन’ नाम से एक कथित तौर पर अपंजीकृत संगठन चलाकर निजी स्कूल प्रबंधनों से बड़ी रकम जुटाने का आरोप लगाया गया था।
Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise
शिकायत के मुताबिक, स्कूल प्रबंधनों से रकम इस दावे के साथ ली जाती थी कि स्कूलों के उन्नयन की मंजूरी, स्थायी मान्यता, भवन योजना की स्वीकृति और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में मदद दिलाई जाएगी। आरोप था कि इसके लिए तत्कालीन सत्तारूढ़ व्यवस्था से अपनी कथित निकटता का हवाला दिया जाता था। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया था कि रकम के लेनदेन के बारे में सार्वजनिक रूप से जानकारी देने पर कुछ निजी स्कूल प्रबंधनों को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई।
इन आरोपों के आधार पर पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की थी। अरसाकुमार को गिरफ्तार कर पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया और बाद में उनके खिलाफ गुंडा एक्ट के तहत निवारक हिरासत का आदेश जारी किया गया।
हाईकोर्ट में अरसाकुमार की पत्नी ने कहा कि उनके पति लंबे समय से संगठन का पंजीकरण कराने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन समान नाम वाले दूसरे संगठन के अस्तित्व के कारण ऐसा नहीं हो सका। याचिका में आरोपों को अलग-अलग निजी स्कूल संगठनों के पदाधिकारियों के बीच विवाद से जुड़ा बताया गया और कहा गया कि यह विवाद सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए गुंडा एक्ट लागू करने का आधार नहीं बन सकता।
याचिका में यह भी कहा गया कि 59 वर्षीय अरसाकुमार जांच में लगातार सहयोग कर रहे थे और काफी समय से हिरासत में थे। अदालत के सामने उनकी ओर से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का भी उल्लेख किया गया। हालांकि, हाईकोर्ट का आदेश मुख्य रूप से अभ्यावेदन पर विचार करने में हुई देरी के आधार पर हिरासत आदेश को रद्द करने पर केंद्रित रहा। अदालत के फैसले से मामले में लगाए गए मूल वित्तीय आरोपों का अंतिम निपटारा नहीं हुआ है और उनकी जांच जारी रह सकती है।
