चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने दहेज उत्पीड़न की शिकायत पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज किए बिना मामला बंद करने वाले ऑल वुमेन पुलिस स्टेशन के एक इंस्पेक्टर और एक सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए दोनों अधिकारियों को पीड़िता के पिता को ₹1-₹1 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने माना कि शिकायत में संज्ञेय अपराध के स्पष्ट आरोप होने के बावजूद पुलिस द्वारा FIR दर्ज न करना कानून के विपरीत है और ऐसी लापरवाही को किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पुलिस अधिकारियों का पहला दायित्व संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर कानून के अनुसार प्राथमिकी दर्ज करना है। यदि शिकायत में दहेज उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप सामने आते हैं तो पुलिस अधिकारियों को अपने स्तर पर मामले का निस्तारण करने या शिकायत बंद करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसी कार्रवाई से पीड़ित पक्ष को न्याय पाने का अवसर प्रभावित होता है और आपराधिक न्याय प्रणाली पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।
मामला उस शिकायत से जुड़ा था जिसमें एक महिला के पिता ने अपनी बेटी के साथ दहेज उत्पीड़न और संबंधित अपराधों के आरोप लगाते हुए ऑल वुमेन पुलिस स्टेशन में शिकायत दी थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि पुलिस ने शिकायत में संज्ञेय अपराध के पर्याप्त आधार होने के बावजूद FIR दर्ज नहीं की और बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए शिकायत को बंद कर दिया। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई को चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड, शिकायत की सामग्री और पुलिस की कार्यवाही का परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि शिकायत में ऐसे आरोप थे जिन पर विधि के अनुसार FIR दर्ज कर जांच शुरू की जानी चाहिए थी। इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों ने कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। अदालत ने इसे गंभीर प्रशासनिक और कानूनी चूक बताते हुए कहा कि पुलिस अधिकारियों की यह लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने दोनों अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से ₹1-₹1 लाख का मुआवजा पीड़िता के पिता को अदा करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राशि सरकारी खजाने से नहीं बल्कि संबंधित अधिकारियों द्वारा स्वयं भुगतान की जाएगी, ताकि जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। न्यायालय ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में व्यक्तिगत उत्तरदायित्व तय नहीं किया गया तो भविष्य में भी पुलिस द्वारा इसी प्रकार की लापरवाही दोहराई जा सकती है।
अदालत ने राज्य सरकार और पुलिस विभाग को संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई शुरू करने पर भी विचार करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कि कानून लागू कराने वाली एजेंसियों से अपेक्षा की जाती है कि वे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करें और प्रत्येक संज्ञेय अपराध की शिकायत पर निष्पक्ष तथा विधिसम्मत कार्रवाई करें। यदि पुलिस स्वयं कानूनी दायित्वों की अनदेखी करेगी तो आम लोगों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होगा।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर FIR दर्ज करना सामान्य नियम है और अपवादस्वरूप ही सीमित परिस्थितियों में प्रारंभिक जांच की जा सकती है। ऐसे में दहेज उत्पीड़न जैसे मामलों में शिकायत को बिना FIR दर्ज किए बंद करना न्यायिक मानकों के अनुरूप नहीं माना जाता।
विशेषज्ञों के अनुसार मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला पुलिस तंत्र को स्पष्ट संदेश देता है कि दहेज उत्पीड़न और महिलाओं के खिलाफ अपराधों की शिकायतों में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है। साथ ही यह निर्णय यह भी रेखांकित करता है कि यदि पुलिस अधिकारी अपने वैधानिक दायित्वों का पालन नहीं करते हैं तो उनके खिलाफ व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जा सकती है और आवश्यकता पड़ने पर आर्थिक दायित्व तथा विभागीय कार्रवाई दोनों का सामना करना पड़ सकता है।
