लुधियाना: पंजाब के लुधियाना में इंडियन बैंक को कथित तौर पर ₹68.91 करोड़ का वित्तीय नुकसान पहुंचाने वाले बड़े बैंक धोखाधड़ी मामले में तीन कारोबारियों सहित सात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि विभिन्न व्यावसायिक फर्मों के माध्यम से लिए गए बैंक ऋण, कथित फर्जी वित्तीय लेनदेन और आपराधिक साजिश के जरिए बैंक को भारी नुकसान पहुंचाया गया। पुलिस ने बैंक की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है। जांच एजेंसियां अब कथित मनी ट्रेल, वित्तीय दस्तावेजों, बैंकिंग रिकॉर्ड और अन्य संदिग्धों की भूमिका की पड़ताल कर रही हैं।
मामले में नामजद आरोपियों की पहचान धरमपाल जैन, जैनेंद्र जैन और अंजू जैन के रूप में हुई है। इनके अलावा दो अज्ञात निजी व्यक्तियों और दो अज्ञात लोक सेवकों को भी प्राथमिकी में आरोपी बनाया गया है। यह मामला इंडियन बैंक की स्ट्रेस्ड एसेट्स मैनेजमेंट वर्टिकल शाखा, चंडीगढ़ के मुख्य प्रबंधक संदीप राठी की शिकायत पर दर्ज किया गया। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि आरोपियों ने विभिन्न व्यावसायिक संस्थाओं के माध्यम से बैंक से कई ऋण सुविधाएं प्राप्त कीं और बाद में ऐसे कार्य किए, जिनसे बैंक को भारी वित्तीय नुकसान हुआ।
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एफआईआर के अनुसार, धरमपाल जैन और जैनेंद्र जैन श्री वल्लभ एक्सपोर्ट्स तथा श्री वल्लभ ओवरसीज के साझेदार हैं, जबकि अंजू जैन ए एंड जे इम्पेक्स की प्रोपराइटर हैं। बैंक का आरोप है कि इन फर्मों और उनके संचालकों ने ऋण खातों तथा वित्तीय लेनदेन में ऐसी अनियमितताएं कीं, जिनके कारण बैंक का बकाया लगातार बढ़ता गया। जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि कथित धोखाधड़ी में अन्य व्यक्तियों और अधिकारियों की क्या भूमिका रही।
शिकायत के अनुसार, 31 मार्च 2026 तक बैंक को ब्याज को छोड़कर लगभग ₹68.91 करोड़ का नुकसान हो चुका था। बैंक ने ऋण वसूली की प्रक्रिया के तहत आरोपियों से जुड़ी कई संपत्तियों की बिक्री भी की है। इसके बावजूद बड़ी राशि की वसूली अभी शेष बताई जा रही है। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि ऋण की राशि का उपयोग किन उद्देश्यों के लिए किया गया और क्या धन को अन्य खातों या संस्थाओं में स्थानांतरित किया गया।
पुलिस के अनुसार, प्रारंभिक जांच के बाद मामला दर्ज किया गया। आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 (आपराधिक न्यासभंग), 420 (धोखाधड़ी) और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। जांच के दौरान बैंकिंग दस्तावेज, ऋण स्वीकृति रिकॉर्ड, खाता विवरण, संपत्ति संबंधी अभिलेख और अन्य वित्तीय दस्तावेजों का परीक्षण किया जा रहा है ताकि कथित धोखाधड़ी के पूरे स्वरूप को समझा जा सके।
जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि क्या कथित फर्जी लेनदेन किसी संगठित आर्थिक अपराध नेटवर्क का हिस्सा थे या फिर यह मामला केवल संबंधित फर्मों तक सीमित है। इसके अलावा अज्ञात निजी व्यक्तियों और लोक सेवकों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। यदि जांच के दौरान किसी अन्य व्यक्ति की संलिप्तता सामने आती है तो उसके खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, मामले में बैंक के आंतरिक रिकॉर्ड, डिजिटल वित्तीय लेनदेन, ऋण वितरण प्रक्रिया और संबंधित दस्तावेजों का विस्तृत विश्लेषण किया जा रहा है। अधिकारियों का मानना है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और बैंकिंग डेटा की जांच से धन के वास्तविक प्रवाह तथा कथित अनियमितताओं की पूरी श्रृंखला सामने आ सकती है। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि ऋण स्वीकृति और उसके बाद की वित्तीय गतिविधियों में कहीं नियमों का उल्लंघन तो नहीं हुआ।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि बड़े बैंकिंग और कॉरपोरेट वित्तीय धोखाधड़ी मामलों में डिजिटल बैंकिंग रिकॉर्ड, ऋण दस्तावेज, वित्तीय लेनदेन, ईमेल संचार और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का वैज्ञानिक विश्लेषण पूरे षड्यंत्र का खुलासा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उनके अनुसार, मजबूत आंतरिक ऑडिट प्रणाली, समय-समय पर जोखिम मूल्यांकन, डिजिटल निगरानी और पारदर्शी ऋण सत्यापन प्रक्रिया ऐसे आर्थिक अपराधों की रोकथाम के लिए आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि समयबद्ध जांच और प्रभावी अभियोजन से वित्तीय संस्थानों में जनता का विश्वास और मजबूत होता है। पुलिस ने कहा कि मामले की जांच जारी है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
