जानकीपुरम समेत छह गांवों में चारागाह-बंजर और अन्य सुरक्षित सरकारी जमीनों पर भूमाफिया की नजर; चार आरोपियों पर FIR, चकबंदी विभाग के 10 पूर्व अधिकारियों पर कार्रवाई की संस्तुति

₹2,000 करोड़ की सरकारी जमीन पर कब्जे की साजिश का खुलासा, फर्जी आदेश से बेच डाली जमीन

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By Roopa
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लखनऊ: राजधानी के जानकीपुरम और आसपास के इलाकों में करीब ₹2,000 करोड़ से अधिक कीमत की सरकारी जमीन को कथित तौर पर हड़पने और उसका बड़ा हिस्सा बेचने की साजिश का मामला सामने आया है। आरोप है कि भूमाफिया ने वर्ष 1988 में चकबंदी विभाग के फर्जी आदेश तैयार कराकर देवा रोड, बीकेटी, इंदिरानगर और जानकीपुरम क्षेत्र के छह गांवों में स्थित चारागाह, बंजर और अन्य सुरक्षित सरकारी जमीनों पर कब्जा जमाने की कोशिश की। बाद में इन जमीनों का एक बड़ा हिस्सा कथित तौर पर बेच भी दिया गया। मामले की जांच में चकबंदी विभाग के तत्कालीन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है।

फर्जी आदेशों के जरिए सरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप

मामले के अनुसार, वर्ष 1988 से सरकारी जमीनों को निजी संपत्ति के तौर पर दर्ज कराने की कथित कोशिश शुरू हुई। आरोप है कि भूमाफिया ने चकबंदी विभाग से संबंधित फर्जी आदेश तैयार कराए और उनके आधार पर सरकारी जमीनों पर अपने अधिकार का दावा किया। इन आदेशों के सहारे जमीनों पर कब्जा किया गया और बाद में उनमें से कुछ हिस्सों की बिक्री भी कर दी गई।

जमीनों में चारागाह, बंजर और अन्य श्रेणी की सुरक्षित सरकारी भूमि शामिल होने की बात सामने आई है। इन जमीनों की मौजूदा अनुमानित कीमत ₹2,000 करोड़ से अधिक बताई जा रही है। मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि कथित फर्जीवाड़ा कुछ दिनों या महीनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई वर्षों तक अलग-अलग स्तरों पर चलता रहा।

चकबंदी अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल

जांच में आरोप है कि चकबंदी विभाग में तैनात रहे कुछ अधिकारी और कर्मचारी भूमाफिया के दावों को सही मानकर उसके पक्ष में आदेश जारी करते रहे। इस वजह से सरकारी जमीनों से जुड़े रिकॉर्ड और अधिकारों की स्थिति लगातार प्रभावित होती रही। पुलिस और विभागीय जांच में वर्ष 1988 से अब तक इस मामले से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की पड़ताल की जा रही है।

जानकीपुरम पुलिस ने भी संबंधित अवधि में चकबंदी विभाग में तैनात रहे अधिकारियों और कर्मचारियों का विवरण मांगा है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि फर्जी आदेश तैयार करने, रिकॉर्ड में बदलाव कराने और जमीनों की बिक्री का रास्ता साफ करने में किस स्तर पर मदद मिली।

2021 में सामने आया मामला, हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान

मामले में वर्ष 2021 में तैनात रहे डिप्टी डायरेक्टर ऑफ कंसॉलिडेशन (DDC) की जांच के दौरान महत्वपूर्ण तथ्य सामने आने की बात कही गई है। इसके बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा और अदालत के हस्तक्षेप के बाद जांच का दायरा बढ़ाया गया।

जिला मजिस्ट्रेट की ओर से की गई जांच के बाद शासन को रिपोर्ट भेजी गई है। रिपोर्ट में चकबंदी विभाग में पूर्व में तैनात रहे 10 अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति किए जाने की जानकारी सामने आई है। अब शासन स्तर पर रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जानी है।

चार आरोपियों के खिलाफ FIR दर्ज

मामले में चकबंदीकर्ता नरेंद्र कुमार की ओर से दी गई तहरीर के आधार पर जानकीपुरम थाने में चार आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। इनमें रामेंद्र कुमार, अमित कुमार, सुनील कुमार और लईक खां के नाम शामिल हैं। आरोप है कि ये लोग भूमाफिया के सहयोगी के तौर पर सरकारी जमीनों पर कब्जे और फर्जीवाड़े की गतिविधियों में शामिल रहे।

डीएम के निर्देश के बाद तहरीर पुलिस उपायुक्त उत्तरी अमित कुमार आनंद को भेजी गई थी। इसके बाद पुलिस ने सोमवार को चारों आरोपियों के खिलाफ संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी।

दस्तावेजों की गहन जांच में जुटी पुलिस

पुलिस अब सरकारी जमीनों से संबंधित पुराने राजस्व और चकबंदी रिकॉर्ड की जांच कर रही है। फर्जी आदेशों की सत्यता, जमीनों के रिकॉर्ड में हुए बदलाव, कब्जे और बाद में हुई कथित बिक्री से जुड़े दस्तावेज भी खंगाले जा रहे हैं। इसके साथ ही यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि जमीनों की बिक्री से किन लोगों को आर्थिक लाभ मिला।

पुलिस उपायुक्त उत्तरी अमित कुमार आनंद के अनुसार, तहरीर के आधार पर आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और दस्तावेजों की गहन जांच की जा रही है। जांच आगे बढ़ने के साथ सरकारी जमीनों को निजी संपत्ति के रूप में इस्तेमाल करने की कथित साजिश में शामिल अन्य लोगों और अधिकारियों की भूमिका भी सामने आ सकती है।

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