तिरुवनंतपुरम। केरल में साइबर अपराध का एक बेहद चिंताजनक और नया चेहरा सामने आया है, जहां अवैध लोन ऐप्स के जरिए बड़े पैमाने पर लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। पुलिस आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में इस संगठित नेटवर्क ने राज्यभर में करीब ₹70 करोड़ की ठगी को अंजाम दिया है। इस मामले ने न केवल वित्तीय सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि डिजिटल युग में व्यक्तिगत गोपनीयता और सामाजिक प्रतिष्ठा पर भी बड़ा खतरा उजागर किया है।
केरल पुलिस की साइबर विंग की विस्तृत रिपोर्ट में सामने आया है कि यह नेटवर्क पूरी तरह संगठित तरीके से काम करता है। इसमें शामिल गिरोह आक्रामक डिजिटल मार्केटिंग, तुरंत लोन मंजूरी और अत्यधिक मानसिक दबाव वाली रणनीतियों का इस्तेमाल करते हैं। जरूरतमंद लोगों को तुरंत पैसा देने का लालच देकर पहले फंसाया जाता है और बाद में ऊंचे ब्याज, धमकी और ब्लैकमेलिंग के जरिए उनसे कई गुना अधिक राशि वसूली जाती है।
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जांच में यह भी सामने आया है कि इन मामलों में हर पांच में से एक पीड़ित गृहिणी होती है, जिससे साफ है कि यह नेटवर्क खास तौर पर कमजोर और घरेलू वर्गों को निशाना बना रहा है। हजारों शिकायतें दर्ज होने के बावजूद केवल लगभग 20 प्रतिशत पीड़ित ही औपचारिक कानूनी कार्रवाई तक पहुंच पाते हैं, क्योंकि उन्हें सामाजिक बदनामी और लगातार धमकियों का डर बना रहता है।
मलप्पुरम जिला ऐसे मामलों का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। वहीं जांच एजेंसियों ने यह भी पाया है कि ठगी की रकम का एक बड़ा हिस्सा बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों तक पहुंचाया गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि इसके पीछे एक व्यापक अंतरराज्यीय नेटवर्क सक्रिय है, जिसमें एजेंट, डिजिटल ऑपरेटर और वित्तीय हैंडलर शामिल हैं।
इन अवैध लोन ऐप्स का संचालन मॉडल बेहद सरल लेकिन खतरनाक है। पीड़ितों को बिना उचित सत्यापन के तुरंत लोन दिया जाता है। एक बार ऐप इंस्टॉल होते ही ये एप्लिकेशन मोबाइल की गैलरी, कॉन्टैक्ट्स और अन्य निजी डेटा तक पहुंच बना लेते हैं। भुगतान में देरी होने पर पीड़ितों को अपमानजनक कॉल, मॉर्फ की गई तस्वीरें और सार्वजनिक बदनामी की धमकियों के जरिए मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है।
साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे गंभीर पहलू यह है कि ये ऐप्स अक्सर APK फाइलों के जरिए इंस्टॉल कराए जाते हैं, जो किसी भी आधिकारिक ऐप स्टोर या सुरक्षा जांच से नहीं गुजरते। इससे अपराधियों को सीधे मोबाइल डिवाइस तक पहुंच और निजी डेटा चोरी की पूरी सुविधा मिल जाती है, जिसका बाद में ब्लैकमेलिंग में इस्तेमाल किया जाता है।
कुछ मामलों में अत्यधिक मानसिक दबाव के कारण गंभीर घटनाएं भी सामने आई हैं। अधिकारियों ने एक छात्र की आत्महत्या के मामले को भी इन लोन ऐप्स से जुड़ी लगातार धमकी और उत्पीड़न से जोड़ा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इसका असर केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य और जीवन पर भी गंभीर प्रभाव डाल रहा है।
साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने इस तरह के मामलों पर चिंता जताते हुए कहा है कि साइबर अपराधी आज केवल पैसा नहीं चुरा रहे हैं, बल्कि वे लोगों के डेटा और डर का इस्तेमाल हथियार के रूप में कर रहे हैं। उनके अनुसार, “आज के साइबर ठग भय, जल्दबाजी और डिजिटल जानकारी की कमी का फायदा उठाकर लोगों को पूरी तरह फंसा लेते हैं, और एक बार जाल में फंसने के बाद बचना बेहद मुश्किल हो जाता है।”
साइबर ऑपरेशंस अधिकारियों ने नागरिकों को चेतावनी दी है कि किसी भी अनजान लोन ऐप या APK फाइल को डाउनलोड न करें और केवल आरबीआई से मान्यता प्राप्त वित्तीय संस्थानों से ही लेन-देन करें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे ऐप्स अत्यधिक ब्याज दरों पर लोन देकर बाद में धमकी और बदनामी का सहारा लेते हैं।
अधिकारियों ने कहा है कि ये प्लेटफॉर्म केवल वित्तीय जाल नहीं हैं, बल्कि मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न का भी साधन बन चुके हैं, जहां लोगों की गरिमा को ही दबाव का हथियार बनाया जाता है।
फिलहाल कानून प्रवर्तन एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क के डेवलपर्स, फंडिंग चैनल और सहयोगियों की पहचान में जुटी हुई हैं। कई मामलों में कार्रवाई शुरू हो चुकी है और अंतरराज्यीय स्तर पर समन्वित जांच जारी है।
अधिकारियों का मानना है कि जागरूकता ही इस तरह के साइबर फ्रॉड से बचाव का सबसे मजबूत हथियार है, और नागरिकों को किसी भी संदिग्ध ऐप से तुरंत दूरी बनानी चाहिए।
