तिरुवनंतपुरम: केरल के सहकारी क्षेत्र में सॉफ्टवेयर खरीद को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद सामने आया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता Ramesh Chennithala ने शुक्रवार को ₹700 करोड़ के कथित घोटाले का आरोप लगाते हुए वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सरकार को कठघरे में खड़ा किया। उनका कहना है कि हजारों प्राथमिक सहकारी समितियों के लिए सॉफ्टवेयर खरीद प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं की गईं, जिससे राज्य को भारी वित्तीय नुकसान हुआ।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेंनिथला ने बताया कि शुरुआत में करीब 4,415 प्राथमिक सहकारी समितियों के लिए सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराने का टेंडर Tata Consultancy Services (TCS) को दिया गया था। इस परियोजना के लिए ₹206 करोड़ का अनुबंध भी साइन किया गया था। हालांकि, बाद में इस कॉन्ट्रैक्ट को रद्द कर दिया गया और नए सिरे से टेंडर जारी किया गया, जिसे लेकर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
चेंनिथला का आरोप है कि नए टेंडर की शर्तें इस तरह से तैयार की गईं कि TCS जैसे अनुभवी खिलाड़ी इसमें हिस्सा ही नहीं ले सके। संशोधित शर्तों के तहत केवल कन्नूर की दो कंपनियों को पात्र बनाया गया, जिनके बारे में उन्होंने दावा किया कि वे सत्तारूढ़ दल से जुड़ी हुई हैं। इनमें से एक—Dinesh Beedi Cooperative Society—ने ₹58 करोड़ की बोली लगाई है, जबकि उसके पास इस क्षेत्र में कोई अनुभव नहीं बताया गया है।
उन्होंने कहा कि पूरे प्रोजेक्ट की लागत अब बढ़कर करीब ₹915 करोड़ तक पहुंच गई है, जो पहले के ₹206 करोड़ के मुकाबले कई गुना अधिक है। इस अंतर को उन्होंने करीब ₹700 करोड़ का संभावित नुकसान बताते हुए इसे “सुनियोजित वित्तीय अनियमितता” करार दिया।
RBI गाइडलाइन से शुरू हुआ था प्रोजेक्ट, केंद्र का सॉफ्टवेयर ठुकराया गया
चेंनिथला ने इस परियोजना की पृष्ठभूमि भी सामने रखी। उनके अनुसार, Reserve Bank of India (RBI) ने 2014 में देशभर में सहकारी संस्थाओं के लिए एक केंद्रीकृत बैंकिंग सॉफ्टवेयर लागू करने के निर्देश दिए थे। इस योजना को केंद्र सरकार के फंड से राज्यों द्वारा लागू किया जाना था, ताकि सहकारी संस्थाओं का डिजिटलीकरण और निगरानी बेहतर हो सके।
हालांकि, केरल सरकार ने केंद्र द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर को अपनाने से इनकार कर दिया और अपनी जरूरतों के अनुसार अलग सिस्टम विकसित करने का निर्णय लिया। इसके बाद टेंडर प्रक्रिया शुरू हुई, जिसमें TCS अकेली बोलीदाता के रूप में सामने आई और 2021 में उसे चयनित किया गया। वर्ष 2024 में इस पर आधिकारिक अनुबंध भी साइन हुआ।
लेकिन वर्ष 2025 में इस कॉन्ट्रैक्ट को रद्द कर दिया गया और नए सिरे से टेंडर जारी किया गया। इसी बदलाव ने अब पूरे मामले को विवादों में ला खड़ा किया है। चेंनिथला का कहना है कि यह निर्णय पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों के खिलाफ है।
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चुनाव आयोग की मंजूरी का इंतजार, सरकार पर बढ़ा दबाव
चेंनिथला ने यह भी दावा किया कि नए टेंडर के तहत कॉन्ट्रैक्ट देने की सभी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और अब राज्य सरकार चुनाव आयोग की मंजूरी का इंतजार कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह पूरी प्रक्रिया जल्दबाजी में और सीमित प्रतिस्पर्धा के साथ आगे बढ़ाई जा रही है।
हालांकि, इस मुद्दे पर राज्य सरकार की ओर से अभी तक कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन सियासी हलकों में यह मामला तेजी से चर्चा का विषय बन गया है, खासकर ऐसे समय में जब राज्य में चुनावी माहौल बन रहा है।
राजनीतिक असर के संकेत, पारदर्शिता पर सवाल
विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में केरल की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है। एक ओर विपक्ष इसे बड़े घोटाले के रूप में पेश कर रहा है, वहीं सत्तारूढ़ पक्ष पर निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
कुल मिलाकर, सहकारी क्षेत्र में डिजिटल सिस्टम लागू करने जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर उठे ये सवाल केवल वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता से भी जुड़े हैं। आने वाले दिनों में इस मामले में और खुलासे होने की संभावना बनी हुई है, जिससे राजनीतिक टकराव और तेज हो सकता है।
