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कानपुर किडनी रैकेट का बड़ा खुलासा: ₹9.5 लाख में खरीदी किडनी ₹90 लाख में बेची, डॉक्टर दंपती समेत 10 हिरासत में

Team The420
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कानपुर: उत्तर प्रदेश के कानपुर में अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का सनसनीखेज खुलासा हुआ है, जहां गरीब और जरूरतमंद लोगों से सस्ते में किडनी खरीदकर उन्हें भारी रकम में जरूरतमंद मरीजों को बेचा जा रहा था। इस पूरे नेटवर्क में डॉक्टर दंपती, अस्पताल संचालक और दलाल समेत 10 लोगों को हिरासत में लिया गया है, जबकि 50 से ज्यादा अस्पताल जांच एजेंसियों के रडार पर आ गए हैं।

मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, यह एक संगठित और लंबे समय से चल रहे रैकेट का रूप लेता नजर आ रहा है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि किडनी डोनर को करीब ₹9.5 लाख देकर सौदा तय किया जाता था, जबकि उसी किडनी को 90 लाख रुपये से ज्यादा में मरीजों को बेचा जाता था।

जांच के दौरान स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की संयुक्त टीम ने शहर के कई अस्पतालों में छापेमारी की। इनमें कुछ ऐसे अस्पताल भी शामिल हैं, जिनके पास वैध रजिस्ट्रेशन तक नहीं था और वे अवैध तरीके से संचालित हो रहे थे। अधिकारियों को मौके पर ऐसे सबूत मिले हैं, जो संकेत देते हैं कि इन अस्पतालों का इस्तेमाल अवैध ट्रांसप्लांट के लिए किया जा रहा था।

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सूत्रों के मुताबिक, इस रैकेट में शामिल गिरोह बाहरी राज्यों से भी कनेक्शन रखता था। किडनी ट्रांसप्लांट के लिए लखनऊ, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों से विशेषज्ञ डॉक्टरों को बुलाया जाता था। ट्रांसप्लांट टीम में नेफ्रोलॉजिस्ट, सर्जन, एनेस्थेसिस्ट और अन्य विशेषज्ञ शामिल होते थे, जिससे पूरे ऑपरेशन को पेशेवर तरीके से अंजाम दिया जा सके।

सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि एक बंद हो चुके अस्पताल में भी किडनी डोनर भर्ती मिला। यह अस्पताल करीब दो महीने पहले बंद हो चुका था, लेकिन इसके बावजूद वहां मरीज को भर्ती कर अवैध गतिविधियां जारी थीं। इससे साफ संकेत मिलता है कि रैकेट के सदस्य कानून से बचने के लिए अलग-अलग ठिकानों का इस्तेमाल कर रहे थे।

जांच में यह भी सामने आया कि एक दलाल ने उत्तराखंड के एक युवक को आर्थिक जरूरत का फायदा उठाते हुए किडनी बेचने के लिए राजी किया। उसे ₹10 लाख देने का वादा किया गया, लेकिन अंततः ₹9.5 लाख ही दिए गए। बाद में इसी किडनी को एक महिला मरीज के परिजनों को ₹90 लाख से अधिक में बेच दिया गया।

मामले का खुलासा तब हुआ जब डोनर को बकाया ₹50 हजार नहीं मिलने पर उसने शिकायत दर्ज कराई। इस शिकायत के आधार पर जब जांच शुरू हुई तो पूरे रैकेट की परतें खुलती चली गईं। पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए कई अस्पतालों में दबिश दी और आरोपियों को हिरासत में लिया।

छापेमारी की खबर फैलते ही इलाके के कई निजी अस्पतालों में अफरा-तफरी मच गई। कई अस्पतालों ने अपनी लाइटें बंद कर दीं और गतिविधियां रोक दीं, ताकि जांच एजेंसियों से बचा जा सके। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि इस नेटवर्क में और भी कई संस्थान शामिल हो सकते हैं।

जांच एजेंसियां अब उन डॉक्टरों और अस्पतालों की पहचान कर रही हैं, जो इस अवैध ट्रांसप्लांट नेटवर्क से जुड़े हो सकते हैं। साथ ही, पुराने मामलों को भी खंगाला जा रहा है, क्योंकि करीब दो दशक पहले भी शहर में इसी तरह का किडनी खरीद-फरोख्त का मामला सामने आ चुका है।

फिलहाल सभी संदिग्धों से पूछताछ जारी है और उनके वित्तीय लेन-देन, कॉल रिकॉर्ड और नेटवर्क की गहराई से जांच की जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस रैकेट से जुड़े और बड़े नाम सामने आ सकते हैं।

यह मामला स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद खामियों और अवैध गतिविधियों पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। साथ ही यह भी दिखाता है कि कैसे जरूरत और लालच के बीच फंसे लोग इस तरह के संगठित अपराध का शिकार बन जाते हैं

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