कानपुर: शहर में अवैध किडनी और लिवर ट्रांसप्लांट के बड़े रैकेट का खुलासा होने से स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। क्राइम ब्रांच और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम ने सोमवार देर शाम कार्रवाई करते हुए इस संगठित गिरोह का भंडाफोड़ किया। मामले में एक डॉक्टर दंपती और एक दलाल को हिरासत में लिया गया है, जबकि डोनर और रिसीवर को भी सुरक्षा घेरे में रखकर उनका इलाज कराया जा रहा है।
जांच में सामने आया है कि केशवपुरम स्थित एक निजी अस्पताल से इस पूरे रैकेट का संचालन किया जा रहा था। डॉक्टर दंपती इस अवैध नेटवर्क के मुख्य संचालक बताए जा रहे हैं, जो जरूरतमंद लोगों को डोनर उपलब्ध कराने से लेकर ट्रांसप्लांट की पूरी प्रक्रिया को मैनेज करते थे। इसके लिए एक संगठित चैनल तैयार किया गया था, जिसमें अलग-अलग शहरों से जुड़े लोग शामिल थे।
सूत्रों के अनुसार गिरोह डोनर को 8 से 10 लाख रुपये का लालच देकर तैयार करता था, जबकि रिसीवर से किडनी या लिवर ट्रांसप्लांट के नाम पर ₹80 लाख तक की रकम वसूली जाती थी। डोनर और रिसीवर के बीच संबंधों को वैध दिखाने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते थे, ताकि कानूनी जांच में मामला सही प्रतीत हो।
जांच एजेंसियों को यह भी पता चला है कि ट्रांसप्लांट के लिए बाहर से डॉक्टरों की टीम बुलाई जाती थी। ऑपरेशन के बाद डोनर और रिसीवर को तुरंत दूसरे अस्पतालों में शिफ्ट कर दिया जाता था, ताकि किसी को शक न हो। इस कड़ी में कल्याणपुर स्थित दो अन्य अस्पतालों की भी भूमिका सामने आई है, जहां ऑपरेशन के बाद मरीजों को भर्ती कराया जाता था।
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सोमवार को मिली पुख्ता सूचना के आधार पर तीन अलग-अलग अस्पतालों में एक साथ छापेमारी की गई। कार्रवाई के दौरान संदिग्ध गतिविधियों के प्रमाण मिलने पर डॉक्टर दंपती और एक बिचौलिए को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की गई। पूछताछ में कई अहम खुलासे हुए, जिनसे इस पूरे नेटवर्क की परतें खुलती चली गईं।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक उत्तराखंड के रहने वाले एक रिसीवर और एक डोनर को भी टीम ने अपने सुरक्षा घेरे में लिया है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि डोनर को करीब ₹3.5 लाख ऑनलाइन ट्रांसफर किए गए, जबकि लगभग ₹6 लाख नकद दिए गए थे। वहीं रिसीवर से ₹80 लाख तक की बड़ी रकम ली गई थी। इस लेनदेन के सबूत जुटाने के लिए डिजिटल और बैंकिंग रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं।
सूत्र बताते हैं कि यह रैकेट लंबे समय से सक्रिय था और कई राज्यों तक इसका नेटवर्क फैला हुआ था। पुलिस को पहले से इस गिरोह की गतिविधियों पर संदेह था और काफी समय से इसकी निगरानी की जा रही थी। जैसे ही ठोस सबूत हाथ लगे, संयुक्त टीम ने कार्रवाई करते हुए पूरे नेटवर्क को उजागर कर दिया।
फिलहाल तीनों अस्पतालों में देर रात तक जांच जारी रही। वहां के दस्तावेज, मरीजों का रिकॉर्ड और ऑपरेशन से जुड़े कागजात खंगाले जा रहे हैं। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि इस अवैध कारोबार में और कौन-कौन लोग शामिल हैं और अब तक कितने ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर अवैध अंग प्रत्यारोपण के काले कारोबार की गंभीरता को उजागर किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के रैकेट न केवल कानून का उल्लंघन करते हैं, बल्कि गरीब और जरूरतमंद लोगों का शोषण भी करते हैं। फिलहाल जांच जारी है और आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना है।
