नई दिल्ली/रांची। झारखंड में सामने आए बहुचर्चित ट्रेजरी घोटाले ने डिजिटल गवर्नेंस मॉडल की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शुरुआती जांच में खुलासा हुआ है कि राज्य के ट्रेजरी सिस्टम के जरिए ₹33 करोड़ से लेकर ₹150 करोड़ तक की सरकारी राशि में हेराफेरी की गई। यह घोटाला 90 के दशक के चर्चित Fodder Scam की याद दिलाता है, लेकिन फर्क यह है कि इस बार पूरा खेल डिजिटल सिस्टम के भीतर रहकर खेला गया।
जांच के केंद्र में राज्य का इंटीग्रेटेड ट्रेजरी प्लेटफॉर्म J-Kuber है, जिसे सरकारी वेतन भुगतान और वित्तीय लेनदेन को पारदर्शी बनाने के लिए लागू किया गया था। लेकिन आरोप है कि इसी सिस्टम का इस्तेमाल अंदरूनी लोगों ने फर्जी भुगतान तैयार करने और रकम को निजी खातों में ट्रांसफर करने के लिए किया।
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प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि संबंधित अधिकारियों ने सिस्टम के भीतर कर्मचारी आईडी, बैंक अकाउंट डिटेल्स और रिटायरमेंट डेट जैसी अहम जानकारियों में बदलाव किए। कई मामलों में रिटायर हो चुके कर्मचारियों को सिस्टम में सक्रिय दिखाया गया, जबकि कुछ मामलों में एक ही व्यक्ति के नाम पर कई एंट्री बनाकर सैलरी को कई गुना बढ़ा दिया गया। एक उदाहरण में ₹43,000 की सैलरी को बढ़ाकर ₹4.3 लाख तक दिखाया गया।
घोटाले का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। हजारीबाग जिले में करीब ₹27 करोड़ की गड़बड़ी सामने आई है, जबकि बोकारो में ₹4 करोड़ से अधिक की अनियमितताएं दर्ज की गई हैं। इसके अलावा रांची, पलामू, देवघर, रामगढ़ और जमशेदपुर समेत कई जिलों में जांच जारी है। कुल मिलाकर यह मामला अब राज्यव्यापी वित्तीय अनियमितता के रूप में उभर रहा है।
बोकारो का एक मामला विशेष रूप से चौंकाने वाला है, जहां एक रिटायर्ड पुलिसकर्मी के नाम पर लगभग तीन वर्षों में 63 ट्रांजैक्शन के जरिए ₹4.29 करोड़ निकाल लिए गए। जांच एजेंसियों को संदेह है कि इस पूरे नेटवर्क में 600 से अधिक लोग किसी न किसी रूप में शामिल रहे हैं या उन्होंने इसका लाभ उठाया है।
इस पूरे मामले में अंदरूनी मिलीभगत के स्पष्ट संकेत मिले हैं। जांच के दायरे में ट्रेजरी अधिकारी, अकाउंट्स स्टाफ, ड्रॉइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (DDO) और वे कर्मचारी शामिल हैं, जो भुगतान को मंजूरी देने की प्रक्रिया में जुड़े होते हैं। सबसे बड़ी खामी यह सामने आई कि कई मामलों में डेटा एंट्री और वेरिफिकेशन का काम एक ही लोगों के हाथ में था, जिससे निगरानी तंत्र पूरी तरह निष्प्रभावी हो गया।
इस घोटाले में एक आरोपी शंभू कुमार का नाम सामने आया है, जिस पर आरोप है कि उसने करीब एक दशक तक सिस्टम की खामियों का फायदा उठाया। जांच में यह भी सामने आया है कि अवैध रूप से अर्जित धन से जमीन खरीदी गई, मकान बनाए गए और महंगे वाहन खरीदे गए, जो इस नेटवर्क के संगठित और लंबे समय से सक्रिय होने का संकेत देता है।
घोटाले की टाइमलाइन पर नजर डालें तो यह लगभग 2011 से 2026 के बीच सक्रिय रहा, जिसमें J-Kuber प्लेटफॉर्म लागू होने के बाद इसमें तेजी आई। इस फर्जीवाड़े का खुलासा अप्रैल 2026 में ऑडिट निरीक्षण के दौरान हुआ, जब डिजिटल डेटा और भौतिक रिकॉर्ड के बीच भारी अंतर पाया गया।
प्रारंभिक कार्रवाई के तहत कई खातों को फ्रीज किया गया है और हजारीबाग में गिरफ्तारियां भी की गई हैं। राज्य सरकार ने सभी 33 ट्रेजरी का व्यापक ऑडिट कराने का आदेश दिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि मामला स्थानीय नहीं बल्कि सिस्टम स्तर की खामी का परिणाम हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घोटाला डिजिटल गवर्नेंस के उस जोखिम को उजागर करता है, जहां तकनीक तो मौजूद होती है, लेकिन निगरानी और नियंत्रण तंत्र कमजोर होता है। इस मामले में सिस्टम को बायपास नहीं किया गया, बल्कि उसी के भीतर रहकर उसे मोड़ा गया।
फिलहाल सरकार ने संदिग्ध खातों पर रोक, लंबे समय से तैनात कर्मचारियों के तबादले और प्रभावित विभागों में वेतन वितरण पर अस्थायी रोक जैसे कदम उठाए हैं। साथ ही, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और धन की रिकवरी का भरोसा भी दिया गया है।
यह पूरा मामला इस बात की चेतावनी है कि डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन केवल तकनीक लागू करने से सफल नहीं होता। इसके लिए मजबूत ऑडिट, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और जवाबदेही जरूरी है, अन्यथा यही सिस्टम बड़े पैमाने पर वित्तीय घोटालों का माध्यम बन सकता है।
