वियना/तिराना। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले एक बड़े साइबर फ्रॉड नेटवर्क का पर्दाफाश करते हुए यूरोपीय एजेंसियों ने एक संगठित कॉल सेंटर आधारित ठगी गिरोह को ध्वस्त कर दिया है। इस कार्रवाई का नेतृत्व Europol और Eurojust ने संयुक्त रूप से किया, जिसमें ऑस्ट्रिया और अल्बानिया की एजेंसियों ने भी अहम भूमिका निभाई। जांच एजेंसियों के मुताबिक, यह नेटवर्क कम से कम €50 मिलियन (करीब ₹450 करोड़) की ठगी में शामिल था।
करीब दो साल तक चली इस जांच के बाद 17 अप्रैल 2026 को बड़े पैमाने पर छापेमारी की गई, जिसमें 10 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। तिराना में संचालित कई कॉल सेंटर और निजी ठिकानों पर कार्रवाई के दौरान करीब €8.9 लाख (लगभग ₹8 करोड़) की नकदी, 443 कंप्यूटर, 238 मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य डिजिटल स्टोरेज डिवाइस जब्त किए गए। एजेंसियों का मानना है कि जब्त किए गए डेटा से इस नेटवर्क के और बड़े खुलासे हो सकते हैं।
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जांच में सामने आया है कि यह गिरोह पूरी तरह कॉर्पोरेट ढांचे की तरह काम करता था। कॉल सेंटर में अलग-अलग विभाग बनाए गए थे—जैसे कस्टमर एक्विजिशन, कस्टमर मैनेजमेंट, फाइनेंस, आईटी और बैक-ऑफिस। प्रत्येक टीम में 6 से 8 लोग होते थे, जबकि पूरे नेटवर्क में करीब 400 से 450 कर्मचारी काम कर रहे थे। टीम लीडर और मैनेजर स्तर पर संचालन को नियंत्रित किया जाता था, जिससे यह पूरी व्यवस्था एक वैध कंपनी जैसी दिखती थी।
इस नेटवर्क का मुख्य हथियार था—फर्जी ऑनलाइन निवेश प्लेटफॉर्म। सोशल मीडिया विज्ञापनों और वेब सर्च के जरिए लोगों को आकर्षित किया जाता था, जहां उन्हें “उच्च रिटर्न” का लालच दिया जाता था। एक बार जब कोई व्यक्ति प्लेटफॉर्म पर रजिस्टर कर लेता, तो उसे “रिटेंशन एजेंट” सौंपा जाता था, जो खुद को निवेश सलाहकार बताकर लंबे समय तक संपर्क बनाए रखता था।
ये एजेंट पीड़ितों का भरोसा जीतने के लिए उनकी भाषा में बातचीत करते थे—जैसे अंग्रेजी, जर्मन, स्पेनिश, इटैलियन और ग्रीक। कई मामलों में आरोपियों ने रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर पीड़ितों के डिवाइस पर पूरा नियंत्रण हासिल कर लिया। इसके बाद उन्हें बार-बार अधिक पैसा निवेश करने के लिए मानसिक दबाव बनाया जाता था।
जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि यह गिरोह सिर्फ एक बार ठगी नहीं करता था, बल्कि “डबल फ्रॉड” रणनीति अपनाता था। यानी जिन लोगों से पहले ही पैसा ठगा जा चुका था, उन्हें दोबारा संपर्क कर यह दावा किया जाता था कि उनकी रकम वापस दिलाई जा सकती है। इसके लिए उन्हें क्रिप्टोकरेंसी प्लेटफॉर्म पर अकाउंट खोलने और €500 (करीब ₹45,000) जमा करने के लिए कहा जाता था—और इस तरह उन्हें फिर से ठगा जाता था।
इस पूरे नेटवर्क की जड़ें अल्बानिया की राजधानी Tirana में स्थित कॉल सेंटर्स से जुड़ी पाई गईं, जबकि इसके शिकार यूरोप के कई देशों के अलावा कनाडा और ब्रिटेन तक फैले हुए थे। जांच की शुरुआत ऑस्ट्रिया की राजधानी Vienna में बड़ी संख्या में सामने आए पीड़ितों के आधार पर हुई थी, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित कार्रवाई शुरू की गई।
अधिकारियों के अनुसार, इस ऑपरेशन में डिजिटल फॉरेंसिक और इंटेलिजेंस शेयरिंग की महत्वपूर्ण भूमिका रही। Europol ने एक वर्चुअल कमांड पोस्ट स्थापित कर विभिन्न देशों के बीच रियल-टाइम डेटा एक्सचेंज सुनिश्चित किया, जबकि Eurojust ने संयुक्त जांच टीम (JIT) के गठन और कानूनी समन्वय में मदद की।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला साइबर अपराध के बदलते स्वरूप को दर्शाता है, जहां अपराधी अब छोटे स्तर की ठगी से आगे बढ़कर कॉर्पोरेट ढांचे और पेशेवर सिस्टम का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह नेटवर्क न केवल तकनीकी रूप से सक्षम था, बल्कि मनोवैज्ञानिक रणनीतियों के जरिए लोगों को फंसाने में भी बेहद प्रभावी था।
यह कार्रवाई इस बात का संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां अब ऐसे संगठित साइबर नेटवर्क्स के खिलाफ अधिक समन्वित और आक्रामक रुख अपना रही हैं। हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि डिजिटल निवेश के नाम पर होने वाली ठगी तेजी से विकसित हो रही है, और इससे बचने के लिए वैश्विक स्तर पर जागरूकता और तकनीकी सतर्कता बेहद जरूरी है।
