नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर ठगी का एक और बड़ा मामला सामने आया है, जिसमें एक 73 वर्षीय रिटायर्ड इंजीनियर को कथित तौर पर ₹10.3 करोड़ की चपत लगा दी गई। इस हाई-प्रोफाइल साइबर अपराध की गंभीरता को देखते हुए जांच अब Central Bureau of Investigation (CBI) को सौंप दी गई है। यह कदम देशभर में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट मामलों पर सख्त रुख के बीच उठाया गया है।
जानकारी के अनुसार, घटना की शुरुआत एक फोन कॉल से हुई, जिसमें खुद को एक मल्टीनेशनल कूरियर कंपनी का कर्मचारी बताने वाले व्यक्ति ने पीड़ित को सूचित किया कि उसके नाम पर एक पार्सल मुंबई एयरपोर्ट पर रोका गया है। कॉलर ने दावा किया कि उस पार्सल में प्रतिबंधित ड्रग्स पाए गए हैं और जल्द ही कथित “क्राइम ब्रांच अधिकारी” उससे संपर्क करेंगे। यहीं से शुरू हुआ एक सुनियोजित साइबर जाल, जिसने पीड़ित को मानसिक रूप से पूरी तरह नियंत्रित कर लिया।
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पीड़ित के बयान के अनुसार, उसे Skype डाउनलोड करने के लिए कहा गया और फिर एक वीडियो कॉल के जरिए उसे तथाकथित जांच प्रक्रिया में शामिल किया गया। इस दौरान उसे करीब 8 घंटे तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ की स्थिति में रखा गया—अर्थात उसे लगातार निगरानी में रखते हुए डर और दबाव के जरिए निर्देशों का पालन करने के लिए मजबूर किया गया।
इस लंबी वीडियो कॉल के दौरान आरोपियों ने पीड़ित को यह विश्वास दिलाया कि वह एक गंभीर आपराधिक मामले में फंस चुका है और उससे बचने का एकमात्र तरीका “जांच में सहयोग” करना है। इसी बहाने उससे अलग-अलग बैंक खातों में कुल ₹10.3 करोड़ ट्रांसफर करवा लिए गए। बाद में जब पीड़ित ने अपने परिवार को इस घटना की जानकारी दी, तब जाकर इस बड़े फ्रॉड का खुलासा हुआ।
शिकायत मिलने के बाद शुरुआती जांच स्थानीय स्तर पर शुरू की गई थी, जहां साइबर सेल ने मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू की। जांच के दौरान करीब ₹60 लाख की राशि को फ्रीज भी किया गया, जो विभिन्न खातों में ट्रांसफर की जा चुकी थी। हालांकि, बाकी रकम तेजी से कई खातों में बांट दी गई थी, जिससे रिकवरी चुनौतीपूर्ण हो गई।
जांच एजेंसियों को शक है कि इस पूरे ऑपरेशन में विदेशी कॉलर्स की भूमिका हो सकती है, जबकि भारत में मौजूद उनके सहयोगियों ने टारगेट की जानकारी जुटाने और बैंकिंग चैनल्स के जरिए रकम ट्रांसफर कराने में मदद की। यह एक क्लासिक ‘मल्टी-लेयर साइबर फ्रॉड’ का उदाहरण माना जा रहा है, जिसमें तकनीक, सोशल इंजीनियरिंग और मनोवैज्ञानिक दबाव का संयुक्त इस्तेमाल किया गया।
पीड़ित ने यह भी बताया कि आरोपियों ने उसे धमकी दी थी कि यदि उसने निर्देशों का पालन नहीं किया तो उसके बच्चों—जो विदेश में रहते हैं—को भी इसी तरह फंसाया जाएगा। इस तरह की धमकियों ने उसे और अधिक भयभीत कर दिया, जिससे वह लगातार आरोपियों के नियंत्रण में बना रहा।
गौरतलब है कि हाल के महीनों में देशभर में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के मामलों में तेजी आई है। इसी बढ़ते खतरे को देखते हुए Supreme Court of India ने स्वतः संज्ञान लेते हुए ऐसे मामलों पर कड़ी निगरानी के निर्देश दिए थे। इसके बाद इस केस को विस्तृत जांच के लिए CBI को ट्रांसफर किया गया।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड पूरी तरह सोशल इंजीनियरिंग पर आधारित होता है, जहां अपराधी डर, अधिकार और कानूनी कार्रवाई के नाम पर पीड़ित को मानसिक रूप से नियंत्रित कर लेते हैं। वीडियो कॉल और फर्जी पहचान का इस्तेमाल इसे और विश्वसनीय बना देता है।”
इस घटना ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि साइबर अपराधी अब पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर हाई-टेक और मनोवैज्ञानिक रणनीतियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। आम नागरिकों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे किसी भी संदिग्ध कॉल, विशेषकर कानून प्रवर्तन एजेंसियों के नाम पर आने वाले वीडियो कॉल या पैसों की मांग से सतर्क रहें।
जांच एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश करने में जुटी हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस संगठित गिरोह के तार देश और विदेश में कहां-कहां जुड़े हैं। वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता और तकनीकी सतर्कता ही ऐसे ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे खतरनाक साइबर फ्रॉड से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।
