जयपुर: ₹80 लाख की साइबर ठगी के एक संवेदनशील मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए बड़े स्तर की साजिश की आशंका जताई और स्पष्ट किया कि पीड़िता को न्याय सुनिश्चित किया जाएगा। यह मामला अजमेर की 83 वर्षीय रिटायर्ड शिक्षिका से कथित ठगी से जुड़ा है, जिसने न्यायिक प्रक्रिया को भी झकझोर दिया है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि आरोपी नवीन तेमानी के खाते में कथित रूप से ठगी की रकम में से केवल ₹5 लाख का ट्रांजैक्शन ट्रेस हुआ है। बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपी इस राशि का दोगुना जमा कराने को तैयार है और मुख्य आरोपी सोवन मंडल है, जो पहले से न्यायिक हिरासत में है। बचाव पक्ष का तर्क था कि तेमानी की भूमिका सीमित है और उसे राहत दी जानी चाहिए।
हालांकि, राज्य की ओर से इस दलील का कड़ा विरोध किया गया। अदालत को बताया गया कि यह मामला एक बड़े साइबर ठगी नेटवर्क से जुड़ा हो सकता है, जिसमें कई लोग शामिल हैं और कई पीड़ित भी हो सकते हैं। जांच एजेंसियों ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी किया गया है और उसके प्रत्यर्पण की प्रक्रिया भी शुरू की जा चुकी है। ऐसे में उसे जमानत देना जांच को प्रभावित कर सकता है।
अभियोजन पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि किसी भी तरह का समझौता या राशि लौटाने की पेशकश इस अपराध की गंभीरता को कम नहीं कर सकती। अदालत को बताया गया कि अब तक इस मामले में 17 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है और जांच अभी जारी है। ऐसे में किसी भी आरोपी को राहत देने से जांच की दिशा प्रभावित हो सकती है।
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इस मामले की एक अहम और भावनात्मक पहलू भी सामने आया, जब 83 वर्षीय पीड़िता खुद व्हीलचेयर पर अदालत में पेश हुईं। कोर्ट ने पहले उनकी स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि उन्हें जयपुर में बेहतर ठहरने और रहने की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए, जिसका खर्च सरकार वहन करे। हालांकि, पीड़िता ने यह प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा कि वह खुद अपनी व्यवस्था संभाल रही हैं।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि लंबी जांच प्रक्रिया के चलते पीड़िता को मजबूरी में ₹10 लाख की राशि स्वीकार करनी पड़ी, जो उनकी कुल हानि के मुकाबले काफी कम है। इस पर अदालत ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला न्यायिक व्यवस्था की संवेदनशीलता को झकझोरने वाला है।
कोर्ट ने इससे पहले मामले के सभी रिकॉर्ड तलब किए थे और वरिष्ठ अधिकारियों को वर्चुअल माध्यम से सुनवाई में शामिल होने के निर्देश दिए थे। अदालत का मानना है कि साइबर ठगी के ऐसे मामलों में गहराई से जांच जरूरी है, ताकि पूरे नेटवर्क का खुलासा हो सके और अन्य संभावित पीड़ितों को भी न्याय मिल सके।
फिलहाल, हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अग्रिम जमानत याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस फैसले का असर न केवल इस केस पर, बल्कि राज्य में बढ़ते साइबर अपराधों पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में केवल रकम की रिकवरी पर्याप्त नहीं होती, बल्कि पूरे नेटवर्क को तोड़ना और दोषियों को सख्त सजा दिलाना ज्यादा जरूरी होता है। ऐसे में अदालत का सख्त रुख यह संकेत देता है कि साइबर अपराधों के खिलाफ न्यायपालिका अब और ज्यादा सतर्क और कठोर हो रही है।
