जबलपुर: मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी “मुख्यमंत्री संजीवनी क्लिनिक” योजना में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है। जिला स्तर पर हुई जांच में खुलासा हुआ है कि जिन क्लिनिकों में बुनियादी मेडिकल उपकरण और कंप्यूटर तक मौजूद नहीं हैं, उन्हें कागजों में पूरी तरह सुसज्जित दिखाकर करोड़ों रुपये के बिल पास कर दिए गए। प्रारंभिक जांच में ही यह संकेत मिले हैं कि घोटाले की राशि ₹10 करोड़ से अधिक हो सकती है।
जांच के दौरान अधिकारियों को यह जानकर हैरानी हुई कि कई क्लिनिकों में न तो ब्लड प्रेशर मशीन है और न ही कंप्यूटर, फिर भी रिकॉर्ड में इनकी खरीद दिखाकर भुगतान किया गया। इसके अलावा मरम्मत और पुताई के नाम पर भी बड़ी रकम निकाली गई, जबकि वास्तविकता यह है कि कई केंद्रों में पिछले दो वर्षों से कोई काम नहीं हुआ।
जांच शुरू होते ही ‘हड़बड़ी में सुधार’ की कोशिश
सूत्रों के अनुसार, जैसे ही जांच शुरू हुई, कुछ क्लिनिकों में जल्दबाजी में प्रिंटर भेजे गए। हालांकि वहां मौजूद डॉक्टरों ने ही सवाल उठाया कि जब कंप्यूटर ही नहीं हैं तो प्रिंटर का क्या उपयोग होगा। इस कदम ने पूरे मामले को और संदिग्ध बना दिया है।
जांच टीम को यह भी पता चला कि करीब ₹93 लाख के उपकरण न तो स्टोर में मिले और न ही किसी क्लिनिक में। स्टोर रजिस्टर में उनकी एंट्री जरूर थी, लेकिन भौतिक जांच में ये पूरी तरह गायब पाए गए। इससे साफ है कि रिकॉर्ड में हेरफेर कर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया।
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फर्जी बिल और कागजी खरीद का खेल
जांच में सामने आया कि करीब 13 फर्जी बिलों के जरिए ₹1.75 करोड़ से अधिक का भुगतान किया गया। जिन सामग्रियों के लिए भुगतान दिखाया गया, वे वास्तव में कभी खरीदी ही नहीं गईं। इसी तरह अलमारियों और अन्य फर्नीचर के लिए भी भुगतान किया गया, लेकिन अधिकांश क्लिनिकों में ये सामान मौजूद नहीं मिला।
मरम्मत और सफेदी के नाम पर भी बड़ी रकम निकाली गई, जबकि कई क्लिनिकों की दीवारों पर वर्षों से पेंट नहीं हुआ। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह खर्च सिर्फ कागजों तक ही सीमित था।
डॉक्टरों ने बताई जमीनी हकीकत
क्लिनिकों में तैनात डॉक्टरों ने जांच टीम के सामने अपनी समस्याएं रखीं। एक मेडिकल अधिकारी ने बताया कि वह पिछले दो वर्षों से अपने निजी टैबलेट के जरिए मरीजों का रिकॉर्ड तैयार कर रही हैं, क्योंकि उन्हें अब तक सरकारी कंप्यूटर नहीं मिला।
उन्होंने यह भी बताया कि ब्लड प्रेशर मशीन और अन्य जरूरी उपकरणों की मांग कई महीनों से की जा रही थी, लेकिन आपूर्ति नहीं हुई। कई डॉक्टरों ने स्वीकार किया कि उन्हें मरीजों का इलाज अपने निजी संसाधनों से करना पड़ रहा है।
50 क्लिनिक, लेकिन बुनियादी सुविधाएं नदारद
जबलपुर जिले में करीब 50 संजीवनी क्लिनिक संचालित हो रहे हैं, लेकिन अधिकांश केंद्रों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। जांच में यह स्पष्ट हुआ कि जिन उपकरणों के लिए भुगतान किया गया, वे न तो स्टोर में मौजूद हैं और न ही क्लिनिकों तक पहुंचे।
जांच का दायरा बढ़ा, बड़े अधिकारियों पर शक
प्रारंभिक रिपोर्ट में संकेत मिले हैं कि इस घोटाले में स्थानीय स्तर से लेकर उच्च स्तर तक कई लोग शामिल हो सकते हैं। 2021 से अब तक के सभी वित्तीय रिकॉर्ड की गहन जांच की जा रही है।
सूत्रों का कहना है कि जांच आगे बढ़ने के साथ घोटाले का दायरा और बढ़ सकता है। कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पहले ही संदेह के घेरे में आ चुकी है।
मुख्य आरोपी पर कार्रवाई, कई निलंबित
मामले में मुख्य आरोपी माने जा रहे स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। इसके अलावा जिला कार्यक्रम प्रबंधन इकाई के कुछ कर्मचारियों को हटाया गया है, एक फार्मासिस्ट को निलंबित किया गया है और संविदा कर्मचारियों पर भी कार्रवाई की गई है।
योजना की विश्वसनीयता पर सवाल
गरीबों को घर के पास मुफ्त इलाज और दवाएं देने के उद्देश्य से शुरू की गई इस योजना में सामने आया यह घोटाला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
फिलहाल जांच जारी है और उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे हो सकते हैं, जिससे पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हो सके।
