बीमार और असहाय मरीजों को बनाया जा रहा निशाना; फर्जी बिलिंग, पहचान चोरी और गलत एनरोलमेंट से फैल रहा बड़ा घोटाला

“हॉस्पिस के नाम पर अरबों का खेल: बुजुर्गों की मजबूरी बन रही मल्टी-बिलियन डॉलर ठगी”

Roopa
By Roopa
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जीवन के अंतिम चरण में देखभाल देने वाली हॉस्पिस सेवाओं के क्षेत्र में एक गंभीर और चिंताजनक धोखाधड़ी का मामला सामने आया है, जिसने पूरे स्वास्थ्य तंत्र की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी और सरकारी फंडिंग के चलते इस सेक्टर में अरबों डॉलर का प्रवाह हो रहा है, जिसका फायदा उठाकर ठग बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा कर रहे हैं।

जांच और रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस घोटाले में मरीजों की पहचान चोरी कर उन्हें बिना जानकारी के हॉस्पिस सेवाओं में शामिल दिखाया जाता है। इसके अलावा कई मामलों में ऐसी सेवाओं के लिए बिलिंग की जाती है, जो कभी दी ही नहीं गईं। खास बात यह है कि कई बार ऐसे मरीजों को भी हॉस्पिस में दाखिल दिखाया जाता है, जिन्हें वास्तव में इस तरह की देखभाल की जरूरत ही नहीं होती।

इस पूरे मामले में अमेरिका का कैलिफोर्निया राज्य सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है, जहां हॉस्पिस फ्रॉड के कई आरोप सामने आए हैं। पहले भी इस विषय पर जांच हो चुकी है, लेकिन अब तक ठोस सुधार लागू नहीं हो पाए हैं। इस स्थिति को लेकर संघीय स्तर पर भी चिंता जताई गई है, जहां इसे निगरानी तंत्र की बड़ी विफलता माना जा रहा है।

कैलिफोर्निया हॉस्पिस एंड पैलिएटिव केयर एसोसिएशन की प्रमुख शीला क्लार्क ने कांग्रेस के सामने गवाही देते हुए कहा कि यह समस्या केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में फैली हुई है। उनके अनुसार, यह मेडिकेयर प्रोग्राम की निगरानी और राज्य-फेडरल समन्वय की कमजोरी का परिणाम है, जिसने गलत तत्वों को पनपने का मौका दिया है।

इस घोटाले का असर केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव आम लोगों के जीवन पर पड़ रहा है। एक पीड़ित ने बताया कि उन्हें एक मामूली चोट के इलाज के लिए मेडिकेयर कवर नहीं मिला, क्योंकि उन्हें बिना जानकारी के हॉस्पिस में पंजीकृत दिखा दिया गया था। ऐसे मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह धोखाधड़ी कितनी गहराई तक पहुंच चुकी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में जानकारी की कमी भी एक बड़ी समस्या है। कई बार सरकारी और निजी डेटाबेस में हॉस्पिस सेवाओं के बारे में पर्याप्त और स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं होती, जिससे लोगों के लिए सही विकल्प चुनना मुश्किल हो जाता है। छोटे और निजी संस्थानों में निगरानी का स्तर और भी कमजोर होता है, जिससे धोखाधड़ी की संभावना बढ़ जाती है।

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विशेषज्ञ जेनिफर मूर बैलेंटाइन के अनुसार, आम लोग हॉस्पिस सेवाओं को लेकर उतने जागरूक नहीं हैं, जितना कि अन्य रोजमर्रा की सेवाओं के बारे में होते हैं। यही कारण है कि ठग इस क्षेत्र में आसानी से लोगों को भ्रमित कर लेते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि किसी भी हॉस्पिस सेवा को चुनने से पहले उसकी विश्वसनीयता, अनुभव और पिछले रिकॉर्ड की जांच करना बेहद जरूरी है।

विश्लेषकों का मानना है कि जैसे-जैसे यह सेक्टर गैर-लाभकारी मॉडल से हटकर व्यावसायिक मॉडल की ओर बढ़ा है, वैसे-वैसे इसमें धोखाधड़ी के मामले भी बढ़े हैं। हालांकि कुछ अपवाद हैं, लेकिन आम तौर पर गैर-लाभकारी संस्थाएं अधिक भरोसेमंद मानी जाती हैं। लंबे समय से संचालित हो रही संस्थाओं पर भरोसा करना अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है।

कई परिवारों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि गलत हॉस्पिस सेवा चुनने से मरीजों को समय पर देखभाल नहीं मिल पाती, जिससे उनकी पीड़ा बढ़ जाती है। वहीं, सही संस्था चुनने पर मरीज को सम्मानजनक और शांतिपूर्ण देखभाल मिल सकती है।

इस पूरे परिदृश्य में एक बात स्पष्ट है कि हॉस्पिस सेवाओं का चयन करते समय सतर्कता और जागरूकता बेहद जरूरी है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी सेवा को अपनाने से पहले व्यक्तिगत जांच, प्रत्यक्ष निरीक्षण और विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी लेना अनिवार्य होना चाहिए।

बुजुर्गों और उनके परिवारों के लिए यह एक चेतावनी है कि भावनात्मक और संवेदनशील परिस्थितियों में भी सावधानी बरतना जरूरी है, ताकि वे इस तरह की धोखाधड़ी का शिकार न बनें।

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